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स्मृतियों की लहर पर ज़िंदगी
लेखक: डॉ. योगेन्द्र
सुबह घर के दरवाज़े खोले तो ठंडी हवा जाड़े का अहसास करा रही थी। पूर्व-उत्तर कोने में रूई के फाहे की तरह बादल थे तो पूर्व-दक्षिण कोने में काले-काले बादल। लगता था कि अब बरसे, कि तब बरसे। इच्छा हुई कि छाता ले लिया जाए, फिर इसे मुल्तवी कर दिया। टहलने के लिए जाते समय हाथ में छाता बाधा उत्पन्न करता है। मन ही मन सोच तारी हुई कि अगर बारिश हुई तो कोई न कोई छत मिल जाएगी, जहाँ बारिश से बचा जायेगा।
कॉलोनी की सीमा को लाँघते हुए जब कच्ची सड़क पर आया तो नज़र आसमान की ओर गई। पूर्व-उत्तर कोने के बादल ने अपनी चाल बदल ली थी और आसमान दिखने लगा था। पूर्व-दक्षिण कोने के बादल वैसे ही थे।
भागलपुर में सुबह सुबह देखता था कि अनेक पक्षी पंख फैलाये उत्तर दिशा की ओर जाते और संध्या में लौट आते। मन में सवाल आता। कहाँ जाते हैं ये पक्षी? दाना चुगने या किसी साथी-संगाती से मिलने? खुले आकाश में तैरते पक्षी। रांची के पक्षी कही आते-जाते नहीं। मैंने अब तक लंबी दूरी नापते हुए पक्षी को नहीं देखा। बिजली की तारों, छतों, मंदिरों पर बैठे हुए मिलते हैं। बहुत बेचैन नजर नहीं आते।
भागलपुर में लोग भी बेचैन नजर आते हैं। रांची में वह बेचैनी नहीं है। संभव है कि मेरी अब तक बेचैन आत्माओं से मुलाक़ात नहीं हुई है, लेकिन सामान्य तौर से आदमी के चेहरे पर बहुत तनाव नहीं है। अनजाने लोग भी कभी-कभी हाल-समाचार पूछ लेते हैं। एक दिन हल्की बारिश हो रही थी। टहल कर लौट रहा था तो एक स्कूटर रुकी। स्कूटर वाले ने पूछा- “कैसे हैं चाचा? मैं आप दोनों को हर दिन जाते हुए देखता हूँ, अच्छा लगता है।”
भागलपुर तो मेरा अपना शहर है। पचास वर्ष लगभग वहाँ गुजारे। जन्मभूमि से ज्यादा तो भागलपुर शहर में रहा। जान-पहचान वाले लोग तो ठीक हैं, अनजाने लोगों के मन में हिक़ारत ही रहती है। उनके व्यवहार बहुत रुक्ष होते हैं। उनके पुकारने की ध्वनि में भी असम्मान का भाव ज्यादा रहता है। तब भी शहर बुरा नहीं लगता। सम्मान-असम्मान से बड़ा होता है लगाव।
जहाँ आप वर्षों रहते हैं, वहाँ की मिट्टी, सड़कें, गलियाँ, नुक्कड़, दुकानें आदि मोहित करते हैं। दोस्तों की एक फ़ौज खड़ी हो जाती है। संबंधों का एक संसार बस जाता है चेतना में। वैसे ही गाँव की गलियाँ कहाँ भूल पाये? जहाँ बचपन गुज़रा,उसने भी चेतना में एक सुरक्षित कोना रिजर्व कर लिया है।
धीरे-धीरे रांची शहर भी स्मृतियों का हिस्सा हो जाएगा। आदमी नये नये अनुभवों से ही समृद्ध होता है। बेंग के लिए कुआँ जितना जरूरी हो, लेकिन मनुष्य के लिए तो खुला आकाश चाहिए।
मनुष्य का जीवन भी अजीब होता है। वह बंधन और मुक्ति- दोनों से अनिवार्य रूप से बंधा है। चिड़िया कम से कम बँधती है, लेकिन मनुष्य के जीवन में बंधन और खुलापन का संतुलन बहुत ज़रूरी है।
जीवन नदी ज़रूर है, लेकिन वह बाढ़ नहीं है। कूल-किनारे को तोड़ती नदी नहीं है। वैसे मनुष्य को भी ज़्यादा सत्ता बाँधने लगती है तो वह विद्रोह करता है। कूल-किनारे को तहस-नहस भी करता है।
समाज के ठेकेदार कभी लाठी, गोली और सत्ता की धौंस दिखाकर मनुष्य की चेतना को अवरुद्ध करते हैं, लेकिन चेतना पर अतिरिक्त दबाव उसे विस्फोट करने के लिए मजबूर करता है।
