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ट्रंपेट वाइन के साथ एक सफ़र: डॉ. योगेन्द्र की आत्मकथा

trumpet wine ke saath ek safar dr yogendra
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ट्रंपेट वाइन के साथ एक सफ़र: टहलने जाता हूँ तो एक खास तरह के फूलों से लदी झाड़ियों को हर दिन देखता हूँ। मुझे ये दिखाई पड़ते। देखते ही अंग्रेज़ी शब्द ट्रंपेट की याद आती। ट्रंपेट की हिन्दी क्या होती है? यह प्रश्न आता और घर लौटते ही दूसरे कामों में लग जाता। प्रश्न जहाँ के तहाँ रह जाते ।

आज निश्चय कर लौटा कि ट्रंपेट की हिन्दी जान लेनी है। गुगल से पूछा। उतर आया – तुरही। तुरही को बचपन से जानता हूँ । शादियों में यह बजायी जाती थी। एक जिज्ञासा तो शांत हुई , लेकिन ट्रंपेट के नीचे लिखा था- ट्रंपेट वाइन और उसके सामने जो चित्र लगा था, वह उन्हीं फूलों का था जो मैं हर रोज़ देखता हूँ । यानी ये फूल जो तुरही ( ट्रंपेट) आकार हैं , उसे ट्रंपेट वाइन कहा जाता है। ये कई रंगों के हैं- सफेद, गाढ़ा गुलाबी, हल्का गुलाबी, गुलाबी और सफेद मिला हुआ और सफ़ेद पर गुलाबी रंग के छींटे। ये फूल पूर्वी उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी हैं। ये रांची कैसे पहुँचे, पता नहीं! फूलों और वृक्षों की अपनी यात्रा- कथा तो होती ही है।

मनुष्य की एक यात्रा हर सुबह नेट पर जारी हो जाती है। मनुष्य मन इससे इतना जुड़ गया है कि जब वह कभी बंद हो जाता है तो उद्विग्नता होती है। कल सुबह आठ बजे के नेट काम नहीं करने लगा। मन बेचैन हो गया। इधर आदत कुछ ज्यादा ही बिगड़ गयी है। एक तो ‘ इन दिनों ‘ पर वीडियो डालने के लिए फ़ेसबुक और एक्स की छानबीन करना और उन समाचारों को जानने की कोशिश करना कि मौजूदा वक्त में चल क्या रहा है? दूसरे, जब वीडियो नहीं डालना होता था, तब भी सोशल मीडिया पर भटकना और मनोरंजक चीज़ों की तलाश जारी रहती थी। मध्य वर्ग अपने में मस्त वर्ग है। उसे लगता है कि वह जो जानता है, जो कहता है, जैसा जीना चाहता है, इसकी छूट उसे मिले। समय के क्रम में इस वर्ग का विकास हुआ और माना जाता था कि यह वर्ग क्रांति का वाहक वर्ग है, क्योंकि असंतोष इसकी घुट्टी में है। लेकिन आज यह वर्ग क्रांति विरोधी भूमिका निभा रहा है। इसका असंतोष इतने तक ही सीमित है कि उसे सत्ता में हिस्सेदारी मिलती रहे।

मैं खुद इसी वर्ग में आता हूँ ।जब शिक्षक था, तब ज्यादा सक्रिय था। सत्ता के खिलाफ बोलता था, लिखता था, जुलूस- प्रदर्शन में शामिल होता था। धरना देता था। मुझे डर नहीं लगता था, न अपने कुलपति से, न सरकार से। विश्वविद्यालय में अफसर था, तब भी कुलपति और कुलाधिपति के खिलाफ बोलता रहता था। इस सिलसिले में कुछ दुश्वारियाँ हुईं, लेकिन अंदर से बल महसूस करता था। दो बार जेल यात्रा भी कर ली और एक बार कुलपति ने कुलाधिपति को पत्र लिखकर और मेरे ऊपर 27 आरोप मढ़ कर मेरा ट्रांसफ़र दूर दराज़ के कॉलेज में कर दिया। मैंने ऐलान किया कि आरोप ग़लत है और मैं ट्रांसफ़र पत्र को नहीं मानूँगा, चाहे कुलाधिपति मुझे बर्खास्त ही क्यों न कर दे। पता नहीं कैसे सुबुद्धि आयी कि मेरा ट्रांसफ़र रूक गया। खैर। अब सेवानिवृत्त हूँ । जरूरत के हिसाब से पेंशन भी मिलती है । समाज में सक्रियता घटी है। लिखना- पढ़ना जारी है । वीडियो की स्क्रिप्ट लिख देता हूँ। कैमरे के सामने पढ़ देता हूँ । सोशल मीडिया पर ज्यादा रहने लगा हूँ, इससे मुझे लगता है कि समय की क्षति होती है । जब नौकरी की ग़ुलामी थी तो मन पर दबाव रहता था। गुलाम मन को जीने की सुविधा होती है। आज़ादी को भोगना और बेहतर दिशा में काम करना आसान नहीं है। आज़ादी अराजकता की ओर भी ले जाती है, यदि आंतरिक अनुशासन न हो तो।

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