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कैंसर ग्रस्त ज्ञान परंपरा: डॉ. योगेन्द्र ने प्रधानमंत्री, डिग्री और बुद्धिजीवियों पर उठाए सवाल

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कैंसर ग्रस्त ज्ञान परंपरा

आप सोचिए कि आपके प्रधानमंत्री कैसे हैं? चुनावी हलफ़नामे में जिस डिग्री का उल्लेख करते हैं, वे नहीं दिखाते। गृह मंत्री अमित शाह एक बार प्रधानमंत्री की डिग्री दिखाने का साहस किया तो पता चला कि ऐसी कोई डिग्री दिल्ली विश्वविद्यालय में होती नहीं। यह पूरी तरह से फर्जी है। गृह मंत्री फर्जी डिग्री दिखा रहे हैं। ऐसा व्यक्ति जो अपनी डिग्री को लेकर ग़लतबयानी करता हो, वह किसी पद के योग्य नहीं है। होना तो यह चाहिए था कि चुनावी हलफ़नामे में ग़लत सूचना देने के कारण उनका चुनाव रद्द होता, लेकिन अदालत ने डिग्री छुपाए रखने का आदेश दिया। अदालत ने भी अपनी गरिमा गिराई है जो पद और रूतबे के आधार पर फ़ैसला करता है।

हालत कितनी बुरी है। 2012 में वे मुख्यमंत्री हैं, तब उन्होंने चुनावी हलफ़नामे में पत्नी का कॉलम खाली छोड़ा और 2014 में उन्होंने पहली बार पत्नी के नाम का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट में मामला गया और सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि समय सीमा के बाद शिकायत की गयी है। गजब का फ़ैसला है। आपने मर्डर किया और दो-तीन साल के बाद पता चला, लेकिन आप मर्डर नहीं हैं।

अदालतें कुछ कहें, कम से कम नैतिकता तो कुछ कहती है। विष्णु के अवतार को कम से कम सच कहना और बोलना चाहिए। क्या विष्णु झूठ ही बोलते रहे? धर्म क्या झूठ से रंगा हुआ है? पत्नी को पत्नी नहीं माना। पत्नी पूरी तरह से प्रतिबद्ध रही, उसने दूसरी शादी नहीं की। सनातन धर्म इसकी भी इजाज़त देता है?

क्या सनातन धर्म कपड़े-लत्ते में सजने-सँवरने का नाम है? धर्म की कमज़ोर नसों को दबा कर और यह प्रचारित कर कि मुझे गंगा ने बुलाया है, हिन्दुओं को ख़ास तौर से भ्रमित किया। गंगा किसी को क्यों बुलायेगी, वह अधमरी पड़ी है। बारह साल विष्णु के अवतार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर क़ाबिज़ हैं, गंगा का क्या हुआ? वह साफ़ हो गई?

जिन लोगों ने वोट दिया और आज भी भरोसा करते हैं, वे प्रधानमंत्री से कम से कम नाले की गैस से चाय बनाने की तकनीक तो सीख लें। गैस सिलेंडर चार सौ से ग्यारह सौ के हुए, नाले की गैस से चाय बनेगी तो कल के दिन भोजन भी बनेगा। गैस इतनी सुलभ हो जाएगी कि गैस पर खर्च जीरो हो जायेगा।

मुझे तो शर्म आती है कि प्रधानमंत्री की ऐसी बेतुकी बातों को सुन कर पढ़े-लिखे लोग तालियाँ बजा रहे थे। ऐसे लोग जो प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के साक्षी रहे, वे अपनी डिग्री जला दें।

देश की दुर्दशा का कारण सिर्फ़ प्रधानमंत्री नहीं हैं। ये पढ़े-लिखे जाहिल लोग हैं, जिन्होंने देश को गर्त में डाला है। दो हजरिया नोट आया था तो एंकर ने उसमें चिप्स ढूंढ लिया था। बेशर्म एंकरों ने कभी माफी नहीं माँगी। मूर्खताओं का बाज़ार खड़ा किया।

प्रधानमंत्री ट्रंप के सामने चिट्ठा लेकर बैठे हैं। किसी भारतीय प्रधानमंत्री को ऐसा करते देखा है? मूर्खता और मूढ़ता को गौरवान्वित करने वाले उनके प्रवक्ता, फर्जी विद्वान, बुद्धिजीवी और उनकी शिविर के नेताओं को कभी दुख नहीं हुआ कि उन्होंने देश को गुमराह किया?

मुझे तो प्रधानमंत्री पर कम, ऐसे लोगों पर ज्यादा खीझ आती है जिन्होंने देश के बौद्धिक कौशल को नीचे गिराया। आज भी बाज नहीं आ रहे।

गांधी-नेहरू होने के लिए रीढ़ चाहिए। बुद्धिजीवियों की रीढ़ में कैंसर बीमारी लग गई है। वे जातिवादी, संप्रदायवादी, लोलुप और सुविधाभोगी हैं।

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