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Bihar Flood: 2020 से 5 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च, फिर भी नहीं थम रहा गांवों का डूबना

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Bihar Flood: बिहार में बाढ़ का संकट एक बार फिर से गंभीर हो गया है। नेपाल में हो रही भारी वर्षा का प्रभाव बिहार की नदियों पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। गंडक, कोसी और बागमती नदियां उफान पर हैं, जिससे छह जिलों के लगभग 2.03 लाख लोग प्रभावित हुए हैं।

गंडक के तेज बहाव ने छह जिलों में छह तटबंधों को तोड़ दिया है। सारण के मकेर इलाके में सारण मुख्य तटबंध दो स्थानों पर टूट गया है, जिससे लगभग 160 फीट का हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ। गोपालगंज के बैकुंठपुर में भी जमींदारी बांध ध्वस्त हो गया है।

पश्चिम चंपारण में भी तीन स्थानों पर तटबंधों के टूटने की खबरें आई हैं। बगहा, बैरिया और योगापट्टी के क्षेत्रों में जल जमाव हो गया है। बाढ़ का प्रभाव केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है। सारण में गंडक की तेज धारा में दो तेंदुए बहते हुए देखे गए। इनमें से एक तेंदुआ तैरकर किनारे पर पहुंच गया और फिर पेड़ पर चढ़ गया। जबकि दूसरा पानी में बह गया।

बाढ़ की वजह से वन्य जीव रिहायशी इलाकों में प्रवेश

बगहा में भी बाढ़ की वजह से वन्य जीव रिहायशी इलाकों में प्रवेश कर रहे हैं। ठकराहा के भवानी टोला में एक मगरमच्छ घर के अंदर घुस गया, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया।

पटना से बेगूसराय और खगड़िया तक गंगा का जलस्तर बढ़ रहा है। पटना में कई घाट फिर से जलमग्न हो गए हैं, जबकि बेगूसराय में बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है।

लेकिन यह स्थिति केवल 2026 की ही नहीं है

बिहार में बाढ़ की समस्या कई दशकों से चल रही है। हर साल मानसून के समय नदियों का जलस्तर बढ़ता है, तटबंधों पर अत्यधिक दबाव बनता है और इसके परिणामस्वरूप गांव और खेत जलमग्न हो जाते हैं।

यह महत्वपूर्ण सवाल उठता है – आखिर बिहार हर साल क्यों बाढ़ से प्रभावित होता है?

बिहार का लगभग 73 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ से ग्रसित है

बिहार भारत के उन राज्यों में शामिल है जो बाढ़ के मामले में सबसे अधिक प्रभावित हैं। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें लगभग 68,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को बाढ़ प्रभावित माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य का 73 फीसदी हिस्सा बाढ़ के खतरे में है।

उत्तर बिहार की स्थिति और भी गंभीर है। यहाँ लगभग 76 फीसदी जनसंख्या बाढ़ के जोखिम वाले क्षेत्रों में निवास करती है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि बिहार में बाढ़ एक असामान्य आपदा नहीं है, बल्कि यह हर साल की पुनरावृत्ति होने वाला संकट है।

बिहार की बाढ़ को समझने के लिए हमें थोड़ी गहराई से देखना होगा। कई नदियों, जैसे कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान, बूढ़ी गंडक, अधवारा और महानंदा, का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल और हिमालयी क्षेत्रों में स्थित है।

इसका मतलब यह है कि बिहार में बारिश कम होने पर भी बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो सकती है। यदि नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है, तो उसका जल तेजी से बिहार की ओर बढ़ता है, जिससे नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप तटबंधों पर अतिरिक्त दबाव बनता है।

बिहार में बाढ़ का संबंध नेपाल से भी

इसलिए, बिहार में बाढ़ का संबंध नेपाल से भी प्रत्यक्ष है। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश, झारखंड एवं अन्य क्षेत्रों में होने वाली वर्षा भी बिहार की नदियों को प्रभावित करती है। स्पष्ट है कि बिहार में बाढ़ का पानी विविध दिशाओं से आता है।

बिहार के बाढ़ इतिहास में 1987 की बाढ़ एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसे आज भी याद किया जाता है। उस वर्ष लगभग 30 जिले और 24,518 गाँव बाढ़ से प्रभावित हुए। इस आपदा में करीब 1399 लोगों की जान गई और 5000 से अधिक जानवरों की भी जान चली गई।

कृषि क्षेत्र में करीब 678 करोड़ रुपये की क्षति हुई है। इस बाढ़ ने स्पष्ट किया कि बाढ़ केवल जल की समस्या नहीं होती, बल्कि इसे कई अन्य संकटों जैसे बीमारियों का आगमन, विस्थापन, फसलों की बर्बादी और रोजगार में कमी के साथ भी जोड़ा जा सकता है। इसके चलते हजारों परिवारों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

फिर भी, बाढ़ का सिलसिला थमा नहीं

1998 से 2002 तक, हर कुछ वर्षों में पुनरावृत्त तबाही का सामना करना पड़ा। 1998 में, उत्तर बिहार की कई नदियों का जल स्तर तेजी से बढ़ा, जिससे बूढ़ी गंडक, बागमती, अधवारा और कोसी के तटबंधों को नुकसान पहुंचा।

इस बाढ़ ने 381 लोगों की जान ले ली और फसलों को लगभग 36,696.68 लाख रुपये का नुकसान हुआ। इसके साथ ही, सार्वजनिक संपत्ति को भी भारी क्षति हुई। 1999 में, नेपाल के जलग्रहण इलाकों में हुई असामान्य बारिश का असर देखने को मिला, जिससे कमला बलान में अचानक बाढ़ आई।

इस बार फसलों को करीब 24,203.88 लाख रुपये का नुकसान हुआ, जबकि सार्वजनिक संपत्ति को लगभग 5,409.99 लाख रुपये का नुकसान हुआ। 2000 में, कमला बलान और भूतही बलान के जलग्रहण क्षेत्र में भारी वर्षा हुई। अगस्त के महीने में पूर्वी कोसी तटबंध टूट गया।

करीब 12,351 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए हैं और 33 जिलों में इसका असर देखने को मिला। इस त्रासदी में 336 लोगों की जान गई। पहले भी, 2002 में उत्तर बिहार बाढ़ की चपेट में आया था, जिसमें 25 जिले प्रभावित हुए और 489 लोग अपने प्राण खो बैठे थे। इसके अलावा, फसलों को लगभग 51,149.61 लाख रुपये का नुकसान हुआ था।

फिर 2004 का वर्ष आया

2004: जब बाढ़ ने कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ डाले
इस वर्ष, उत्तर बिहार की नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में जुलाई के पहले सप्ताह से भारी बारिश का दौर शुरू हुआ। बागमती, बूढ़ी गंडक, कमला बलान, भूतही बलान और अधवारा नदी समूह में स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। बागमती के दुब्बाधार क्षेत्र में जलस्तर अपने पिछले उच्चतम स्तर से लगभग 1.18 मीटर ज्यादा हो गया।

बूढ़ी गंडक और कमला बलान में भी रिकॉर्ड जलस्तर देखी गई। इस दौरान 53 तटबंध टूट गए, जिससे लगभग 9,346 गांव प्रभावित हुए। दो करोड़ से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए, जिससे 885 लोगों की अकाल मृत्यु हुई और 3,272 जानवरों की भी जान गई।

फसलों को 522 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ, जबकि सार्वजनिक संपत्ति को 1,030 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।

विशेष रूप से गंगा नदी के हालात उतने चिंताजनक नहीं थे

इससे एक बात फिर सामने आई। उत्तर बिहार की बाढ़ में स्थानीय और नेपाल से आने वाली नदियों की भूमिका कितनी बड़ी है।

2005 और 2006 के वर्ष अपेक्षाकृत सामान्य रहे, लेकिन 2007 में उत्तर बिहार ने एक बार फिर से गंभीर बाढ़ का सामना किया। इस वर्ष, कई प्रमुख नदी बेसिनों में जोरदार बारिश हुई, विशेषकर बूढ़ी गंडक और बागमती बेसिन में, जिसके परिणामस्वरूप जलस्तर में वृद्धि हुई।

तटबंधों में 28 स्थानों पर दरारें आईं, जिससे 22 जिले प्रभावित हुए। इस बाढ़ ने लगभग 2.4 करोड़ लोगों को अपनी चपेट में ले लिया, जिसमें 1287 लोगों की जान चली गई। इसके अलावा, 2400 से अधिक मवेशियों की मौत हुई और एक करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि पर असर पड़ा।

इस बाढ़ को बिहार की सबसे विनाशकारी बाढ़ों में गिना जाता है

अब बात करें 2008 की, तो यह साल कोसी बाढ़ के लिए जानना जरूरी है। 18 अगस्त 2008 को नेपाल के कुशहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध में एक बड़ी दरार आई, जिससे कोसी ने अपना रास्ता बदल लिया।

इस बाढ़ का पानी नेपाल के सुनसरी और सप्तरी से होते हुए बिहार के सुपौल, मधेपुरा, अररिया, सहरसा, कटिहार और पूर्णिया तक पहुँच गया। लगभग 50 लाख लोग प्रभावित हुए और 258 लोगों की मृत्यु हुई। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि कोसी को बिहार का ‘शोक’ क्यों कहा जाता है।

बाढ़ का दंश 2008 के बाद से थमा नहीं है। 2013 में, 20 जिलों को इस आपदा ने प्रभावित किया, जिससे लगभग 59 लाख लोग इसके शिकार बने और 200 से अधिक लोग अपनी जान गंवा बैठे।

2016 में गंगा की प्रचंड बाढ़ ने 15 जिलों को अपने घेरे में लिया, और इसके चलते लगभग 88 लाख लोग प्रभावित हुए। इस त्रासदी में 228 लोगों की मौत हुई।

2017 में उत्तर बिहार के 19 जिलों में अत्यधिक बाढ़ आई, जिसके कारण 1.7 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए और 514 लोगों ने अपनी जान खोई। इसके बाद, 2019 में सीतामढ़ी और मधुबनी सहित 13 जिलों में बाढ़ का प्रकोप देखा गया। इस बार करीब 85.6 लाख लोग प्रभावित हुए और 130 से ज्यादा लोगों की जान चली गई।

2020 में कोरोना महामारी के दौरान बाढ़ ने स्थिति को और बिगाड़ दिया, जिसमें 19 जिलों में एक करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए। इसके बाद, 2021 से 2023 तक भी कई जिलों में बाढ़ और जलभराव की स्थिति बनी रही, जिसमें दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण और उत्तर बिहार के अन्य जिले लगातार प्रभावित होते रहे।

2024 में नेपाल के बराजों से भारी मात्रा में पानी छोड़ने के कारण उत्तर बिहार के कई क्षेत्रों में स्थिति खराब हो गई थी। इस दौरान कई तटबंध टूट गए, जिससे लगभग 11.84 लाख लोग प्रभावित हुए। 2025 में भी बाढ़ ने 47 लाख लोगों को अपनी चपेट में लिया और 26 से अधिक लोगों की जान गई।

अब, 2026 में भी स्थिति में कोई विशेष सुधार नजर नहीं आ रहा है

गंडक और अन्य नदियों के जल स्तर में वृद्धि ने छह जिलों में गंभीर संकट पैदा कर दिया है, जहां छह तटबंध टूट चुके हैं।

बिहार में बाढ़ नियंत्रण की सबसे बड़ी कठिनाई तटबंधों की स्थिति है। जब नदियों का जलस्तर बढ़ता है, तो इन पर दबाव भी बढ़ जाता है। नेपाल से अचानक पानी का अधिक प्रवाह आने पर हालात और भी गंभीर हो जाते हैं।

कई बार नदी का प्रवाह अपना दिशा परिवर्तित कर देता है, जिससे कटाव बढ़ता है और तटबंध कमजोर हो जाते हैं। एक बार जब कोई तटबंध टूट जाता है, तो पानी तेजी से आसपास के गांवों में फैल जाता है। 2026 में गंडक के तेज प्रवाह के कारण हुए तटबंधों के टूटने का दृश्य भी यही कहानी आगे बढ़ा रहा है।

सारण के मकेर में मुख्य तटबंध लगभग 160 फीट टूट गया. गोपालगंज में जमींदारी बांध ध्वस्त हुआ. पश्चिम चंपारण में भी तीन जगह तटबंध टूटे।

बाढ़ से निपटने के लिए सरकार हर साल काफी धनराशि आवंटित करती है। उपलब्ध डेटा के अनुसार, 2020 से लेकर अब तक लगभग 5,100 करोड़ रुपये बाढ़ सुरक्षा उपायों पर निवेश किए जा चुके हैं।

इसके अलावा, वर्ष 2026 के लिए बाढ़ सुरक्षा योजनाओं के लिए लगभग 1,117 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है, जिसमें सरकार ने 384 परियोजनाओं पर काम करने की बात कही है।

लेकिन असल प्रश्न यह नहीं है कि बाढ़ पर इतना पैसा क्यों लगाया जा रहा है।

वास्तविक सवाल यह है कि इतना खर्च होने के बाद भी हर साल वही स्थिति क्यों उत्पन्न होती है? जब मानसून आता है, तो तटबंधों को लेकर चिंता क्यों बढ़ जाती है? नदियों का जलस्तर बढ़ते ही गांवों में क्यों भय का माहौल बन जाता है?

और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है…

यदि हर साल तटबंध मजबूत किए जाते हैं, करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, और बाढ़ नियंत्रण की योजनाएं तैयार की जा रही हैं, तो फिर लाखों लोगों को हर साल राहत शिविरों और ऊंची सड़कों का सहारा क्यों लेना पड़ता है?

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