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शहर के अंदर उगता एक जंगल: बदलते शहर, बदलती चेतना और गांधी पर डॉ. योगेंद्र के विचार
शहर के अंदर उगता एक जंगल: मैं गाँवों में पला, उस शहर में रहा जो गाँव का ही विकसित रूप था। मुंगेर और भागलपुर में गाँव लिपटा नज़र आता था। लेकिन इधर के कुछ वर्षों में शहर में उपभोग का दौर चला। कुछ लोगों के पास संपत्ति और संसाधन इकट्ठे हुए। उनके लिए स्पेस चाहिए था। तब बहुमंज़िली इमारतों का चलन हुए।
नवधनिकों ने शहर को अंदर से बदल डाला। पुराने घर तोड़े जाने लगे और उसमें से नयी दुकानें और अपार्टमेंट निकलने लगे। भागलपुर को बदलते हुए देखा। पटना तो जैसे ऑवरब्रिज का ही शहर हो गया है। नये अपार्टमेंट्स, होटल और चमचमाती दुकानें।
जो लोग अशोक राजपथ में रहते होंगे, वे उस पथ के बिगड़ते स्वरूप से जरूर परिचित होंगे। उस पथ में साइंस कॉलेज, बी एन कॉलेज, पटना कॉलेज पटना, पटना विश्वविद्यालय आदि हैं। उनके रूख अब गंगा पथ की ओर मोड़ दिया गया है। गंगा पथ चमक रहा है, पता नहीं कितने लोगों का खाना, घर और बुनियादी सुविधाओं की आय उसे बनाने में लगे हैं।
पटना के ऑवरब्रिज, सड़कें, मकान और दुकानें सिर्फ़ इतने भर नहीं हैं कि वे बदल गये हैं, बल्कि उनके साथ आदमी की चेतना और दिमाग भी बदल जाते हैं।
सुबह पटना की सड़कों पर घूमना
सुबह पटना की सड़कों पर घूमने के लिए निकला। घूमना एक तरह से आदत में शामिल हो गया है। जैसे पहले डाकिया जरूर आता था, वैसे ही मेरा घूमना भी।
रात देर हो गई थी। एक मित्र हैं जिनके यहाँ कम से कम पच्चीस लोगों का खाना बना था। विभिन्न तरह के मांस के व्यंजन। मैं था शाकाहारी। इस समूह में सिर्फ़ दो लोग थे। शेष सब मांसाहारी थे।
रात के ग्यारह बज गए। जहाँ रूका हुआ हूँ, वहाँ आते-आते बारह। दस बजे के पहले ही सो जाता रहा हूँ। अगर नहीं सो पाया तो नींद उचटी रह जाती है। नींद आती जाती रही। चार बजे पूरी तरह से नींद ग़ायब थी। किसी तरह एकाध घंटे काट कर दिनचर्या शुरू कर दी।
सभी सोये पड़े हैं। उन्हें आदत हो गयी है। मनुष्य की चेतना समय और संसाधन के अनुसार बदल जाती है।
पटना में गांधी की भाषा, साहित्य और संस्कृति पर सेमिनार
सेमिनार में नयी नयी बातें और अनुभवों को सुनने का अवसर मिलता है।
खुदाबख्श लाइब्रेरी, पटना में गांधी की भाषा, साहित्य और संस्कृति पर दो दिवसीय सेमिनार था। कल राज्यपाल उद्घाटन के लिए आये थे।
बहुत दिनों बाद समाजवादी चिंतक अरविंद मोहन को सुनने का मौक़ा मिला। कभी मृणाल पांडे हिन्दुस्तान की संपादिका थी। अरविंद मोहन और अरुण कुमार त्रिपाठी वहां काम कर रहे थे तो मेरे कई लेख हिन्दुस्तान के संपादकीय पृष्ठ पर छपे थे।
मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी और गंभीरता से नहीं किया। नौकरी, बैठकें और आंदोलन में शरीक रहा। लेखन का दायित्व पूरी तरह से नहीं निभाया। अब वक्त गुजर चुका है।
सेमिनार को भी मैं इग्नोर ही करता रहा हूँ। मैंने ‘हिन्द स्वराज’, ‘इतिहास चक्र’ और सभ्यता पर लेख लिखा है, जिस पर आज कुछ बातें कहनी हैं।
वैसे जो सभ्यता विकसित हो गई है, उसमें गांधी पर बात करना कठिन है। उन्होंने प्रयोग किए, लेकिन अब प्रयोग की हिम्मत किसे है? अब तो नकलचियों का युग है।
