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मंदिर यात्रा और पाखंड: इन दिनों बाबाजी का टोटका और सरकते पाजामे

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मंदिर यात्रा और पाखंड: बिहार के टटका शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी एक मंदिर पहुँचे और वहाँ के पुजारी ने मिथिलेश तिवारी की गर्दन झुकायी और पीठ पर झाड़ू फेर दी। यह दृश्य देखकर रोना भी आता है और ग़ुस्सा भी। हाथ में अँगूठी, माथे पर टीका , गर्दन में जनेऊ और बाबाजी का झाड़ू ।

सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री की शपथ ली और दौड़ पड़े मंदिर । जम कर पूजा की। उन्हें जनता ने नहीं जिताया , बल्कि जितानेवाले मंदिर में पत्थर की मूरत बने बैठे हैं ।

मंदिर vs शिक्षा और विकास

खुद प्रधानमंत्री ने जितने मंदिरों के उद्घाटन किए, उतने तो विश्वविद्यालय नहीं बनाए । नब्बे हज़ार सरकारी स्कूल बंद कर दिया।

बिहार के नये- नवेले स्वास्थ्य मंत्री हैं जिनसे अपना पाजामा तक नहीं सँभल रहा। उनको हर दिन ट्रेनिंग दी जा रही है ।

BJP में परिवारवाद का आरोप

तेरह मंत्री ऐसे हैं जिसके पिता या तो मुख्यमंत्री रहे या मंत्री रहे। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री कांग्रेस के परिवारवाद को कोसते हैं । अपनी सरकार और अपनी राज्य सरकारों के मंत्रिमंडल में मौजूद बेटे- बेटियों से उन्हें अथाह प्यार है।

दरअसल ढकोसला और पाखंड को विस्तारित करने में बीजेपी सरकार, नेता और कार्यकर्ता का अभूतपूर्व योगदान है।

आम जीवन में बढ़ता पाखंड

आम जीवन में भी पाखंड उतर आया है। एक तो समस्याएँ जीवन में विकराल रहती हैं तो लोग अज्ञात सत्ता की ओर देखने लगते हैं । अज्ञात सत्ता का अस्तित्व है या नहीं, इस पर आम लोग ज़्यादा नहीं सोचते । उन्हें लगता है कि अलौकिक सत्ता है और पूरी श्रद्धा से उसके सामने नतमस्तक होते हैं । उस पर नेताओं का पाखंड ।

बढ़िया हो कि बीजेपी सरकार सभी स्कूलों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को बंद कर दे और मंदिरों की बहाली करे। जितने बेरोजगार हैं, सभी को मंदिरों में लगा दें ।कोई पुजारी बनेगा, कोई भिखारी बनेगा, कोई सफ़ाईकर्मी बनेगा, कोई छिनतई करेगा । भारत आख़िर विश्वगुरु कैसे बनेगा?

महफूजुर्रहमान आदिल की ग़ज़ल और हौसले की बात

महफूजुर्ररहमान आदिल की ग़ज़ल की दो पंक्तियाँ हैं-
“वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
हौसले मुश्किलों में पलते हैं ।”

वक़्त ऐसा उल्टा- पुल्टा है कि उनकी गर्दिशों पर ग़म लोग कैसे न करें? यह सच है कि हौसले मुश्किलों में पलें या नहीं, लेकिन उनकी ज़रूरत मुश्किलों में ज़रूर होती है । इस देश को हौसले की बहुत ज़रूरत है ।

डर का माहौल और आर्थिक आलोचना

हिंसक होते समाज में डर व्याप्त हो गया है । डरा हुआ मन और समाज या देश स्वतंत्र बुद्धि या मेधा का नहीं होता । नतीजा होता है कि उसकी अवनति होने लगती है।

प्रधानमंत्री खुलेआम डर पैदा कर रहे हैं । वे कह रहे हैं कि पेट्रोल का कम इस्तेमाल करें या साल भर तक शादी तक में सोना नहीं ख़रीदें । यह बात सिर्फ़ वे समझ लें, उनके मंत्री और उनके पूँजीपति- मित्र समझ लें। देश पर कृपा बरसने लगेगी।

फ़ाइव ट्रिलियन इकोनॉमी का दावा है। अड़ानी ने पिछले दस सालों में बेशुमार संपत्ति हड़पी है। बीजेपी के ख़ज़ाने में पूंजी उपला रही है । पाँच वर्षों में कांग्रेस ने जितने अपने दफ़्तर नहीं बनाए, बीजेपी ने पिछले दस साल में हर ज़िले में हाईटेक दफ़्तर खड़े कर लिए । यह पैसा कहाँ से आया?

गारंटी और विश्वास का टूटना

दूकान में पहले कपड़े के रंग की गारंटी दी जाती थी। अब साफ़ कह दिया जाता है कि रंगों की कोई गारंटी नहीं है । प्रधानमंत्री ने रबड़ी की तरह पूरे देश में इतनी गारंटियाँ बाँटी कि गारंटी पर भी भरोसा ख़त्म हो गया ।

इसलिए अब इस देश में किसी चीज़ की गारंटी नहीं है, न रंग की, न ज़िंदगी की, न शिक्षा की, न स्वास्थ्य की, न सुरक्षा की। हर तरफ़ जंगल के क़ानून की दख़ल बढ़ रही है ।

जो भी हो, लेकिन हर मुश्किल का सामना तो मनुष्य ही करता आ रहा है।

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