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संविधान दिवस की राजनीति पर डॉ योगेन्द्र का हमला, आपातकाल, RSS, चुनाव और लोकतंत्र पर उठाए सवाल
उम्र ढलती है तो थोड़ी- सी गर्मी भी मन को उद्विग्न कर जाती है । जून महीने में बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन आकाश गर्म ही रहता है। सूरज पूरे पराक्रम के साथ आकाश में नमूदार रहता है । सड़कें और गलियों में गर्मी का ही राज है। यहां तक कि जब छतें गर्म हो जाती हैं तो कमरे में बैठना भी मुश्किल होता है। पंखा के घूमने से हवा भले इधर से उधर होती है, गर्मी क़ायम रहती है। आज 26 जून है । साल भर बाद जब यह तारीख़ लौट कर आती है तो आपातकाल की याद दिलाती है । पूरे 51 वर्ष बीत गए ।
संविधान संविधान खेलना आजकल की राजनीति का अनिवार्य अंग
आपातकाल का समर्थन कोई नहीं करता। मजा यह है कि जिसने उस वक्त समर्थन किया था, वे संविधान हत्या दिवस मना रहे हैं । संविधान संविधान खेलना आजकल की राजनीति का अनिवार्य अंग है। जो लोग संविधान की ऐसी- तैसी कर रहे हैं, वे संविधान की रक्षा के लिए शाब्दिक तलवारें भाँज रहे हैं । संविधान जब लागू हुआ तो आरएसएस के मुख्य पत्र में लेख लिख कर संविधान का विरोध किया था और मनुस्मृति की वकालत की थी। रामलीला मैदान में अम्बेडकर और नेहरू के पुतले जलाए गए थे । आज भी इस संविधान की हालत क्या है? राम- रहीम को हत्या- बलात्कार के सिलसिले में सजा मिल चुकी है ।
साधुओं और विधायिका में बैठे लोग मनुस्मृति की वकालत कर रहे
उसे पेरोल पर पेरोल मिल रहा है और शरजिल इमाम पिछले छह साल से क़ैद खाने में है। न मुक़दमा चलाया जा रहा है, न रिहा किया जा रहा है। चुनावी हुई सरकारों को ख़रीद फ़रोख़्त कर गिरा दिया जाता है । संसद- विधायकों की हाट लगायी जा रही है। करोड़ों मतदाताओं को सूची से बाहर किया जा चुका है। चुनाव में धाँधली के क़िस्से सरेआम हैं ।
साधुओं और विधायिका में बैठे लोग मनुस्मृति की वकालत कर रहे हैं । हिन्दू- मुसलमान कर देश की चेतना को दो फाड़ कर दिया गया है । बुलडोज़र और इनकांउटर का राज है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश तक की अवहेलना की जाती है । संविधान को माथे से लगाने से कोई संविधान प्रेमी नहीं हो जाता ।
जोशीले युवा पर देशद्रोही और गद्दार के फिकरे कसे ही जा रहे
सरकार इस कोशिश में लगी रहती है कि 51 साल की पुरानी कहानी इसलिए कही जाय कि वर्तमान में उनके द्वारा की जा रही बदमाशी छिप जाए । जोशीले युवा चार दिनों से जंतर- मंतर पर बैठे हैं । उन पर देशद्रोही और गद्दार के फिकरे कसे ही जा रहे हैं । उन पर हमले भी हो रहे हैं और दिल्ली पुलिस मूक बनी हुई है । युवाओं को जो खाना और पानी पहुँचा रहे हैं, उनके घरों पर पुलिस पहुँच रही है । आप तस्करों से चंदा लें, गद्दार पूँजीपतियों से लगान वसूली करें। अरबों पीएम केयर का हिसाब न दें। विदेश यात्रा पर आठ सौ करोड़ फूँक दें तो कोई बात नहीं ।
हर ज़िले में काला धन से आलीशान दफ़्तर बना लें । चुनाव में वोटरों को ख़रीदें, सब जायज़ है। धरना पर बैठे लोगों के लिए भोजन- पानी जुटा दिया तो संज्ञेय अपराध हो गया । राम मंदिर के चंदा चोरों को बचाने के लिए हज़ारों तिकड़म हैं । चोरी हुई, लेकिन प्राथमिकी दर्ज नहीं होगी । एक मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तो ज़मीन घोटाले के संगीन आरोप हैं, तब भी जमे हुए हैं । इसी मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाला हुआ । गवाह तड़प तड़प कर मर गए, मगर मुक़दमे का फ़ैसला नहीं आया।दरअसल दूसरे घर का चोर चोर, अपने घर का चोर महान देशभक्त ।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का भी कभी-कभी माथा फिर जाता है। उन्हें बीजेपी के मोहन यादव का समर्थन क्यों करना? सिर्फ़ इसलिए कि वे यादव हैं । ऐसी दशा में समाजवाद का चोला उतार फेंकिए । समाजवाद इस रास्ते से क़तई नहीं गुज़रेगा अखिलेश जी।
