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इन दिनों गुस्सा, आत्महत्या और प्रदर्शन: डॉ योगेन्द्र का शिक्षा व्यवस्था और सिस्टम पर बड़ा प्रहार
आज़ादी के दो स्वर और युवाओं की उम्मीदें
आज़ादी की लड़ाई के दो स्वर थे। एक स्वर भगत सिंह का था- “सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए क़ातिल में है” और दूसरा स्वर था महात्मा गांधी का- “दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल/ साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।
अंग्रेज़ों के जुल्म से युवा भड़के हुए थे और उन्हें लगता था कि शांतिपूर्ण आंदोलन से कुछ नहीं होगा। अंग्रेज़ जालियाँवाला जैसा कांड करते हैं और उन्हें उनके ही तरीक़े से जवाब देना होगा। उन्होंने अंग्रेज़ों को जवाब दिया, गोली चलाकर और गोली खाकर। वे न डरे, न थमे। देश को आज़ादी मिली। सबके साथ युवाओं को भी भरोसा हुआ कि उनकी बातें सुनी जायेंगी। उनके लिए सस्ती शिक्षा और रोज़गार मिलेंगे। उनका जीवन सुखमय और समृद्ध होगा।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और सिस्टम द्वारा ‘कत्ल’
अठहत्तर वर्ष की आज़ादी के बाद युवा जंतर-मंतर पर बैठे हैं। माँग कर रहे हैं कि शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें, क्योंकि उनके ही कार्यकाल में बार-बार परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हुए। हाल में जब नीट (NEET) परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक हुए तो कम से कम पचीस युवा-युवतियों ने आत्महत्या कर ली, जिसमें:
- ऋतिक मिश्रा
- अंशिका पांडे
- प्रदीप मेघवाल
- सिद्धार्थ हेगड़े
- आकांक्षा चतुर्वेदी
- भाग्यश्री
- रेणु मीणा
- रिया कुमारी थापा
- उमेश माली
- अनुकीर्तना
- शिवानी यादव
- कहान पटेल
- रीमा बेगम
- मैथिली
- अवंतिका
- जतिन
- गोपिका आदि।
सामान्य तौर पर यह आत्महत्या का मामला लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि सिस्टम ने उनका कत्ल किया है और जो सिस्टम चला रहे हैं, उन्हें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।
वे ज़िम्मेदारी लेने के बजाय युवाओं को धमका रहे हैं। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने सार्वजनिक मंच से कहा कि बीजेपी के कार्यकर्ता इन्हें सबक सिखा देंगे। सरकार सारी चीज़ों पर हक जमाती है, लेकिन वह ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
युवा आज शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। एक संवेदनशील सरकार को युवाओं से तत्काल बात करनी चाहिए थी और मामले को सुलझा लेना था। उनसे सरकार बात भी नहीं कर रही है, न शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दे रहे हैं। शांतिपूर्ण आंदोलन की आवाज़ को अगर आप नहीं सुनेंगे और युवा हिंसा और आत्महत्या की राह पर जायेंगे तो इसका दोषी कौन होगा?
चौपट शिक्षा व्यवस्था और बिहार के विश्वविद्यालयों का हाल
वैसे मेरा मानना है जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर युवाओं की माँग अगर मान भी ली जाय, तो शिक्षा की बीमारी जायेगी नहीं। यह मामला बहुत पेचीदा हो गया है। हमने शिक्षा व्यवस्था को चौपट कर दिया है।
बिहार में ऐशो-आराम की ज़िंदगी जी रहे कुलाधिपति और मुख्यमंत्री सालों साल गुज़रने के बाद विश्वविद्यालयों में अदना प्रतिकुलपति और कुलपति नियुक्त नहीं कर पा रहे। कुलाधिपति जहाँ रहते थे, उसका पहला नाम था- राजभवन। बाद में नाम बदला और अब हो गया लोक भवन। लोकभवन इतना निकम्मा है कि ढंग के एक कुलपति भी नियुक्त नहीं कर पा रहे। शिक्षकों की नियुक्ति की बात ही भूल जाइए।
अतिथि शिक्षकों का आंदोलन और यूजीसी (UGC) के मानक
तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय में विभिन्न विषयों में 70 अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी। उनकी नियुक्ति को कुलाधिपति ने रद्द कर दिया। दस-बारह दिनों से वे आंदोलन कर रहे हैं। कुलाधिपति कार्यालय क्या पूरी तरह से अंधा है? शिक्षक अपने प्रमाण पत्रों के लिए ज़िम्मेदार हैं। नियुक्ति तो कुलपति और उनकी समिति करती है। अगर गड़बड़ी हुई है तो कुलपति पर प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं हुई? वे अपने लोगों को बचायेंगे और कत्ल बच्चों की करेंगे।
कुलाधिपति ने शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक सर्कुलर जारी किया है, जो यूजीसी (UGC) के मानकों से अलग है। हज़ारों उच्च डिग्री धारी बच्चे सड़कों पर कुलाधिपति के सर्कुलर जला रहे हैं और माँग कर रहे हैं कि इसे वापस लें। कुलाधिपति और मुख्यमंत्री को यूजीसी द्वारा निर्धारित शिक्षकों की नियुक्ति को मान लेने में क्या परेशानी है? वे बेवजह इसमें टाँग क्यों अड़ा रहे हैं?
