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Dr Yogendra Article: सौंदर्य और ख्वाहिशें, जुलाई की धूप; कटहल का स्वाद और साधुओं के बिजनेस पर डॉ. योगेन्द्र का साहित्यिक प्रहार

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Dr Yogendra Article: जुलाई का महीना और वृक्षों का समाजवाद जुलाई का महीना है। बारिश होनी चाहिए थी, मगर गगन की कथा यह है कि सूरज चमक रहा है और मेघों का कोई ठिकाना नहीं । आम के बगीचे से गुज़रता हूँ तो वे आम के बिना श्रीहीन हो गए हैं। यों हरी- हरी पत्तियों की कोई कमी नहीं है । लेकिन फल तो फल होते हैं। फलों से लदे वृक्ष पिता की तरह लगते हैं। सैकड़ों पुत्रों को अपने ह्रदय से लगाये हुए । वे सभी पुत्रों के प्रति सदय रहते हैं । जड़ों से रस खींच कर उन्हें समृद्ध करते हैं। कोई कोताही नहीं बरतते । वे वृक्ष हैं, इसलिए समाजवादी हैं। मनुष्य की तरह पूंजी नहीं हड़पते।

कहा गया है-वृक्ष कबहुँ न फल भखै, नदी न संचय नीर। परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर । यह सच है कि वृक्ष अपने फल नहीं खाते, न नदी अपना पानी संचय करती है । आजकल के साधुओं की जमात की बात कुछ और है। वे परमारथ के कारण शरीर धारण नहीं कर रहे। साधुत्व का खूब बिज़नेस कर रहे हैं । कबीर का जमाना था, तब कुंभन दास की कीर्ति थी, तब सीकरी से उन्हें काम नहीं था। वे लिखते हैं-

“संतन को कहा सीकरी काम॥/ आवत जात पन्हैयाँ टूटीं, बिसरि गयौ हरि-नाम॥ /जाकौ मुख देखैं दुख लागै, ताको करिबे परी सलाम।/‘कुंभनदास’ लाल गिरधर बिन और सब बेकाम।”

बाबा नागार्जुन की कविता और कटहल का स्वाद
जो भी हो। जुलाई के इस माह में आम्र- वृक्ष के सारे फल टूट गये हैं, लेकिन कटहल बचा हुआ है। आम के झुंड में कम से कम बीसों कटहल के पेड़ हैं । नागार्जुन का आह्लाद कटहल को देखकर मचल उठता है-

“ अह्, क्या खूब पका है यह कटहल
अह्, कितना बड़ा है यह कटहल
अह्, कैसा मह- मह करता है यह कटहल
अह्, कैसे खुद ही गिर पड़ा गाछ से
अह्, किस तरह पड़ा है चारों खाने चित्त
अह्, कैसा लटका था लोगों का मन इसके ऊपर
अह्, क्या खूब पका है यह कटहल । “

नागार्जुन स्वाद के अद्भुत कवि हैं । उन्होंने एक कविता लिखी है- बहुत दिनों के बाद । उस कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं-

“ बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर भोगे
गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर
—बहुत दिनों के बाद। “

दरिद्रता का छिलका और प्रकृति का आचरण
कवि के ह्रदय में बसा एक संसार है । इस संसार को तबाह करती है दरिद्रता। उन्होंने कटहल के छिलके की दरिद्रता से अविस्मरणीय तुलना की है-

“ मैं दरिद्र हूँ
पुश्त पुश्त की दरिद्रता
कटहल के छिलके
जैसी जीभ से
मेरा लहू चाटती आयी।”

दरिद्रता की भयावहता दृष्टिगोचर हो जाती है , जब उसकी कटहल के छिलके जैसी जीभ से तुलना होती है। जो भी हो, प्रकृति अपने को लुटाती है। वह बांटती रहती है और मनुष्य प्रकृति से कुछ नहीं सीखता। सांसारिक लोगों में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं, जिसकी आत्मा में प्रकृति के आचरण बसते हैं, लेकिन साधुओं ने तो कुहराम मचा रखा है। वे संसार को ही लुटना चाहते हैं। अहंकार से माथा भरा रहता है। बोलियों में विनय नहीं और उस पर कामिनी और कंचन पर उनकी मुग्धता – अजीब तरह की दुर्गंध क्रियेट करती है। साधु के मन में प्रेम की जगह नफ़रत और करुणा की जगह घृणा।

मनुष्य को जंगल होने से बचाना है
प्रकृति से कटती दुनिया कहाँ ठहरेगी पता नहीं, लेकिन एक कवि की चाहत का आत्मिक स्वाद लीजिए—

“बचाना है—
नदियों को नाला हो जाने से
हवा को धुआँ हो जाने से
खाने को ज़हर हो जाने से :
बचाना है—जंगल को मरुस्थल हो जाने से,
बचाना है—मनुष्य को जंगल हो जाने से।

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