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Dr Yogendra On Parliament: संसद से RSS, शिक्षा व्यवस्था और लोकतंत्र पर तीखे सवाल

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रांची: वरिष्ठ चिंतक एवं लेखक डॉ योगेन्द्र ने अपने ताजा लेखों में संसद, लोकतंत्र, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), जातिवाद और बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जब संसद की गरिमा पर संकट हो और जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त की चर्चा सामान्य हो जाए, तब लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी जनता के कंधों पर आ जाती है।

संसद और लोकतंत्र पर टिप्पणी

डॉ योगेन्द्र ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली आज वैभव और सत्ता के अहंकार का प्रतीक बनती जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सांसदों की खरीद-फरोख्त की चर्चाएं अब सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं और यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

उन्होंने कहा कि राजनीतिक अवसरवाद तात्कालिक लाभ दे सकता है, लेकिन इतिहास ऐसे लोगों को सकारात्मक रूप में याद नहीं रखता। उनके अनुसार कठिन परिस्थितियों में सिद्धांतों पर टिके रहने वाले लोग ही इतिहास में स्थान पाते हैं।

RSS और जातिवाद को लेकर सवाल

अपने दूसरे लेख में डॉ योगेन्द्र ने RSS पर निशाना साधते हुए कहा कि संगठन के भीतर नेतृत्व संरचना को लेकर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं। उन्होंने कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खड़गे द्वारा RSS के पंजीकरण और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर उठाए गए सवालों का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान हर नागरिक को सवाल पूछने का अधिकार देता है और किसी भी संगठन को लोकतांत्रिक सवालों से ऊपर नहीं माना जा सकता। लेख में RSS के नेतृत्व, संविधान और तिरंगे को लेकर ऐतिहासिक संदर्भों का भी उल्लेख किया गया है।

शिक्षा व्यवस्था पर चिंता

अपने तीसरे लेख में डॉ योगेन्द्र ने बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बिना पर्याप्त आधारभूत संरचना, शिक्षकों और कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित किए नए राजकीय महाविद्यालय खोल रही है।

उन्होंने कहा कि कई कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी है, जबकि पहले से कार्यरत शिक्षकों को डेपुटेशन पर भेजा जा रहा है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

विश्वविद्यालयों में अव्यवस्था का आरोप

डॉ योगेन्द्र ने विश्वविद्यालयों में कुलपति और प्रति कुलपति की नियुक्तियों में देरी, परीक्षा प्रणाली की समस्याओं, सेवानिवृत्त कर्मचारियों को लंबित लाभ और छात्रों की परेशानियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण छात्रों और शिक्षकों दोनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

लोकतंत्र और शिक्षा को बचाने की अपील

लेख के अंत में डॉ योगेन्द्र ने कहा कि लोकतंत्र लोकलाज से चलता है और जब सत्ता एवं संस्थानों से जवाबदेही खत्म होने लगती है, तब समाज और नागरिकों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए जनजागरण की आवश्यकता पर बल दिया।

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