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एक चिंगारी नहीं, मुकम्मल बयान है: दिल्ली में युवाओं के संघर्ष पर डॉ. योगेन्द्र का लेख
दिल्ली में जो कुछ हो रहा है, वह अभूतपूर्व है। संघर्ष करते युवा और युवतियां । निडर, बेख़ौफ़ । डिटेन किया जाता है, वे बस की खिड़कियों से कूद जाते हैं । डिटेन करनेवाली बसों के सामने खड़े हो जाते हैं। बस की चाभी ले भागते हैं । पुलिस से वे डरते नहीं। लड़कियाँ कहती हैं- डिटेंन क्यों करते हो? गोली मार दो। मैं डरनेवाली नहीं । वे जिनके भी बेटे- बेटियां हैं, गर्व करें कि उन्होंने उसे जन्म दिया। मरना- जीना लगा रहता है। यहां कोई नहीं रहा है। रह गये हैं किस्से। वे किस्से जो भरोसा दिलाते हैं। जो बताते हैं कि जीवन का अर्थ क्या है? क्यों जीते हैं आप?
सत्ता के लिए धोखे का सहारा
उस जीवन पर थूकिए जिसने देश से झूठ बोला। सत्ता के लिए धोखे का सहारा लिया। स्विस बैंक से काला धन लाने वाले का मुंह कितना काला है। देश पर बदनुमा दाग है। हर वर्ष दो करोड़ नौकरियों का वादा, तलबाने लगा पकौड़े। अपने शौक मौज करता रहा। टैक्स पेयर के करोड़ों करोड़ यात्राओं में फूँके। मंदिर का पैसा लुटवाया। बैंकों को तबाही की कगार पर ले आया। महंगाई सिर पर चढ़ कर बोलती रही। पेट्रोल से लेकर गैस सिलेंडर की क़ीमतें बढ़ती रहीं। रूपया गिरता रहा। अडानी बेख़ौफ़ होकर देश लूटता रहा। बैंकों को लूट कर बहुत से भगोड़े देश से चंपत हो गया। कभी नोटबंदी, कभी जीएसटी। राष्ट्रीय कर्ज बढ़ता गया और घर में हिन्दू मुस्लिम करता रहा। लोकतांत्रिक संस्थाओं को इसने जानबूझकर बर्बाद किया। यहां तक कि वोट की भी डकैती करता रहा। किसानों, मज़दूरों, निर्धनों को उजाड़ता रहा और पूँजीपतियों और अपना घर भरता रहा।
अच्छे दिन आयेंगे का नारा देने वाले के बुरे दिन आ गए
यह तो अच्छा हुआ कि बेटे- बेटियों का कारवां सड़कों पर आ निकला। गांधी, अम्बेडकर, भगत सिंह, अशफाक उल्ला, नेहरू, पटेल, सुभाष चन्द्र बोस जैसे लोग जरूर खुश होंगे कि उनकी परंपरा को युवाओं ने थाम लिया। अच्छे दिन आयेंगे का नारा देने वाले के बुरे दिन आ गए। 20 जुलाई के संसद मार्च से ही पता चल गया था कि दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल साकार होने जा रही है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह संसद से मुंह छिपाए फिरते रहे। उनके लग्गू- भग्गुओं में इतनी ताकत नहीं थी कि युवाओं के सवालों का जवाब दे सकते। संसद में हंगामे होते रहे और दो पहलवान आने से कतराते रहे।
नेहा बोरा ने संघर्ष कर अपना रास्ता बनाया
दुष्यंत कुमार ने कहा था-“ एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो/ इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।’ अब तो दिए में सिर्फ़ बाती और चिंगारी नहीं है, बल्कि ज्वाला है जो धधक रहा है। युवाओं ने रास्ता दिखाया है। नेहा बोरा की सिर्फ़ प्रशंसा नहीं होनी चाहिए। उसमें पुलिस और सत्ता से जूझने और विचारों की अभिव्यक्ति की जो क्षमता, वह अद्वितीय है। आगे आनेवाले समय में उसकी बातें सुनी जायेंगी और करोड़ों लोग उन रास्तों पर चलेंगे। देश के लिए हवा का ताज़ा और अनोखा झोंका है। ठगी के खिलाफ बुलंद आवाज़। नेहा बोरा ने संघर्ष कर अपना रास्ता बनाया है। उसके आगे- पीछे कोई नहीं था और उसने आवाज़ लगाई। मैं उसकी संघर्ष- क्षमता और विचारों की अभिव्यक्ति पर मुग्ध हूँ। मुझे लग रहा है कि जिस देश में ऐसी बेटियां हैं, उस देश का कोई बाल बाँका नहीं कर सकता।
