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Hindu Islam Conversion Supreme Court Verdict: हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने पर OBC आरक्षण का क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट का अहम रुख
Hindu Islam Conversion Supreme Court Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति दूसरे धर्म को अपनाता है, तो उसका सामाजिक पिछड़ापन हिंदू सामाजिक व्यवस्था से अन्य धर्मों तक नहीं पहुंचाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को यदि वह हिंदू सामाजिक व्यवस्था में पिछड़ा वर्ग या अनुसूचित जाति से संबंधित है, तो वह दूसरे धर्म को अपनाने के बाद उसी आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रचूड़ की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट द्वारा जारी उस आदेश के खिलाफ तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि इस्लाम स्वीकार करने वाले किसी व्यक्ति को केवल धर्म परिवर्तन के कारण ‘पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम)’ श्रेणी में आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस निर्णय को कायम रखा, जिसमें तमिलनाडु सरकार की उन अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया गया था जो धर्म परिवर्तन कर चुके मुसलमानों को आरक्षण प्रदान करती थीं। हाई कोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया था कि इस्लाम स्वीकार करने वाले व्यक्ति को केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर आरक्षण का अधिकार नहीं मिल सकता।
केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं
7 अगस्त को, सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रखा था।
राज्य सरकार ने अपनी अपील में यह तर्क प्रस्तुत किया कि उच्च न्यायालय का यह फैसला कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाता है, जो एक विशेषज्ञ विधायी आयोग की सिफारिशों के आधार पर बनाई गई कार्यकारी नीति में न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से जुड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसने धर्म परिवर्तित मुसलमानों को आरक्षण प्रदान करने वाली तमिलनाडु सरकार की अधिसूचना को अस्वीकार कर दिया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया था कि कोई भी व्यक्ति, जो इस्लाम धर्म अपनाता है, केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।
इससे पहले, 7 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
राज्य सरकार ने अपनी अपील में यह तर्क दिया कि उच्च न्यायालय का यह निर्णय कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाता है, जो कि एक विशेषज्ञ वैधानिक आयोग की सिफारिशों के आधार पर तैयार की गई कार्यकारी नीति में न्यायिक हस्तक्षेप से संबंधित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने निर्णय का आधार प्रस्तुत किया है। यह फैसला हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जातिगत सामाजिक पिछड़ेपन और धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के अधिकार से संबंधित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जाति से संबंधित होने के कारण किसी व्यक्ति को दूसरे धर्म में जाकर आरक्षण का दावा करने का अधिकार नहीं है। उनका तर्क यह है कि धर्म परिवर्तन से व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है।
