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ईमानदार सिस्टम चाहिए, कड़े क़ानून नहीं! डॉ. योगेन्द्र ने सुनाया विश्वविद्यालय का वो भावुक किस्सा
देश और संसद में प्रश्न पत्र लीक पर बहुत शोरगुल है। बहुत सी बातें कहीं और सुनीं जा रही हैं । मैं आपको आज परीक्षा से जुड़ी एक कहानी सुनाऊँगा।
तत्कालीन कुलपति ने मुझे 2017 में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय का प्रोक्टर बनाकर परीक्षा का प्रभार दे दिया। मैं पहले ही दिन जब कुर्सी पर बैठा तो छात्र- छात्राओं का हुजूम। छात्रों की विभिन्न तरह की समस्याएं थीं, लेकिन उस समय एक ज्वलंत समस्या थी— वह थी पार्ट थ्री का एडमिट कार्ड।
बहुत से छात्र आकर कहने लगे कि मुझे एडमिट कार्ड नहीं मिल रहा। मैंने पूछा- परीक्षा फ़ार्म भरा है? सभी कहते- हॉं। मैं घनचक्कर में था। जब बच्चों ने फ़ार्म भरा है तो फिर एडमिट कार्ड क्यों नहीं मिल रहा?
मैंने परीक्षा नियंत्रक को बुलाया। उनसे मैंने पूछा कि जब बच्चों ने फ़ार्म भरे हैं तो फिर एडमिट कार्ड क्यों नहीं मिल रहे? उनके चेहरे पर कोई शिकन न थी। वे आश्वस्त थे कि यह कोई समस्या नहीं है! उन्होंने कहा कि ये छात्र ऐसे हैं, जिनका रजिस्ट्रेशन समाप्त हो गया है। इन्हें पॉंच साल में स्नातक पास कर लेना था, मगर ये समय के साथ अपना कोर्स पूरा न कर सके, इसलिए इन्हें एडमिट कार्ड नहीं मिलेगा।
राजभवन के कड़े नियम और असहाय परीक्षार्थी
परीक्षा नियंत्रक के कहने के बाद मैं समझ गया। मैंने परीक्षा के नियमों को जानने की कोशिश की। पार्ट थ्री में वही बच्चे फ़ार्म भर सकते थे जो पार्ट वन और पार्ट टू उत्तीर्ण हों। और उन्हें हर हाल में थ्री ईयर डिग्री कोर्स पॉंच साल में पूरा करना है। राजभवन से बने हुए नियम थे। इन्हें कोई कैसे अवहेलना करे! मैं भी रट्टूमल की तरह इसे दुहराने लगा। छात्र हताश निराश आते। मैं ख़ुद को सिद्धांत पर अड़नेवाला मानता था। भला मैं कैसे इधर उधर होता!
छात्र परेशान। वे बरामदे में टहलते। इधर से उधर बौखते। परीक्षा नियंत्रक पुडिया चबाते रहते। अपनी बग़ल में एक थूकदानी भी रखते। मैं तो नया योगी बना था। मैंने राजभवन के नियमों को रट्टा मार लिया था।
“तो मैं क्या करूँ? ज़हर खा लूँ?” — जब एक बेबस माँ की गुहार ने हिला दिया
इस बीच एक दिन बी आर एम कॉलेज, मुंगेर की एक लड़की आयी। गोद में बच्ची थी। दरवाज़े पर उसकी मॉं खड़ी थी। उसने अपना दुखड़ा रोया।
कहने लगी— “मैं बी आर एम कॉलेज की बी कॉम की छात्रा हूँ। पार्ट वन मैंने प्रथम श्रेणी से पास किया। फिर मेरी शादी हो गयी। ससुरालवालों ने पढ़ाई छुड़ा दी। मैं हाउस वाइफ़ बन गयी। मेरी बच्ची हुई। पति ने मुझे दुत्कारना शुरू किया। दो साल बाद उसने मुझे छोड़ दिया। मैं मॉं के पास आ गयी। फिर मैंने सोचा कि अपनी पढ़ाई पूरी कर लूँ। कॉलेज से संपर्क किया। उसने पार्ट टू का फ़ार्म भरवा दिया। मैंने परीक्षा दी। प्रथम श्रेणी से पास किया। पार्ट थ्री का फ़ार्म भरा। अब विश्वविद्यालय कहता है कि तुम्हारा पॉंच वर्ष पूरा हो चुका है, इसलिए एडमिट कार्ड नहीं मिलेगा। आप मेरा एडमिट कार्ड दिलवा दीजिए।”
मैं तो प्याज़ खाये बैठा था। मैंने साफ़ साफ़ कहा कि यह संभव नहीं है। एडमिट कार्ड नहीं मिलेगा।
“तो मैं क्या करूँ? ज़हर खा लूँ? पति ने छोड़ दिया। गोद में बच्ची है। किसी तरह जीवन गुज़ार रही हूँ। सोच रही हूँ कि पढ़ लूँगी तो कोई काम मिल जायेगा, लेकिन आप भी एडमिट कार्ड नहीं दे रहे।” वह रूआंसी होने लगी।
“नियम तुम्हारे पक्ष में नहीं है। एडमिट कार्ड नहीं मिलेगा।” मैं अडिग था।
इस बीच उसकी मॉं कमरे में आयी। बोली— “बेटा! मेरी बेटी पर दया करो।”
“नहीं, यह संभव नहीं है।”
बेटी पहले रोने लगी। फिर चीख़ने लगी— “कैसा विश्वविद्यालय है यह? अगर समय नहीं बचा था तो मुझसे फ़ार्म क्यों भरवाया? कोई बात नहीं समझता। मैं क्या करूँगी अब।” मॉं- बेटी रोती रही। मैं तो कठकरेजा लेकर बैठा था, थोड़ा भी नहीं पिघला। मॉं- बेटी रोती चिल्लाती चली गयी।
रात भर उधेड़बुन और कुलपति से मुलाकात
विश्वविद्यालय से जब वापस आया तो मॉं बेटी का चेहरा घूमता रहा। उसका रोना, चीख़ना, चिल्लाना। मन में एक सवाल— वह ग़लत नहीं कह रही थी। उससे परीक्षा फ़ार्म क्यों भरवाया गया? पति ने उसे छोड़ दिया, क्या विश्वविद्यालय भी उसे मरने छोड़ देगा? विश्वविद्यालय का काम क्या है? वह छात्रों लिए है या किसी और के लिए? क्या विश्वविद्यालय परीक्षा लेने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है?
मैं भयानक उधेड़बुन में था। रात भर नींद उचटती रही। जब नींद टूटती, मॉं बेटी रोती कलपती सामने आ जाती। सुबह हुई। मैं कुलपति प्रो नलिनीकॉंत झा के पास पहुँचा। मैंने पूरी बात बतायी।
उन्होंने मुझसे पूछा— “उपाय क्या है?”
मैंने कहा— “परीक्षा बोर्ड की बैठक बुलाइए और ऐसे लड़के लड़कियों को परीक्षा में बैठाने का निर्णय लेकर राजभवन को भेज दीजिए।”
परीक्षा बोर्ड की ऐतिहासिक बैठक और फैसला
आख़िर परीक्षा बोर्ड की बैठक बुलायी गयी। कुलपति उसके अध्यक्ष होते हैं। सभी संकाय के डीन सदस्य और परीक्षा नियंत्रक मेंबर सेक्रेटरी। बैठक में परीक्षा के नियम पढ़े गये। सभी ने कहा कि नियम ऐसे लड़कों के पक्ष में नहीं है।
मैं बैठक में आमंत्रित सदस्य था। मैंने तर्क देना शुरू किया। यह विश्वविद्यालय छात्रों का है। सैंकड़ों छात्र आज महज़ एडमिट कार्ड के लिए परेशान हैं। उनसे फ़ार्म भरवा लिया गया। उनसे फ़ीस ली गयी। बच्चे नियम से अनभिज्ञ थे। उन्हें अगर एडमिट कार्ड नहीं दिया गया तो उनका जीवन तबाह हो जायेगा।
गर्मा गर्मी बहस के बाद सभी सहमत हुए। ऐसे बच्चों को एडमिट कार्ड देने का निर्णय हुआ। मैं जब अपने कमरे में आया तो मैं बहुत ख़ुश था।
“कम से कम मुझे अपने ग़ुस्से और गाली से मुक्त रखती होगी”
मैंने बी आर एम कॉलेज के प्रिंसिपल को फ़ोन लगाया। उनसे कहा कि उस लड़की को सूचना दीजिए कि वह पार्ट थ्री की परीक्षा देगी जो मेरे पास रोती हुई आयी थी। उसे मैंने पूरी बात बतायी।
