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इन दिनों: सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है | डॉ योगेन्द्र
कई बार धोखा हो जाता है । आप परिस्थिति को समझ नहीं पाते और आकलन में कमी रह जाती है। अगर संबंध में भावनाओं का जोश हो तो जोखिम और बढ़ जाती है। लेकिन व्यक्ति और समाज को इसी में जीना पड़ता है । कोई भी व्यक्ति ज्योतिषी नहीं होता कि भविष्य का सटीक आकलन कर दे।
बहुत से लोगों को ग्रह- नक्षत्रों में विश्वास होता है। वे ज्योतिषियों द्वारा बताए गये पत्थरों को उंगलियों में धारण करते हैं । मैं इस ज्ञान से ना के बराबर परिचित हूँ। किसान परिवार से हूँ ।परिवार मेहनत- मजदूरी करता रहा है, इसलिए कभी ज्योतिष के पास नहीं गया।
चलते- फिरते ज्योतिषी से संपर्क
मैं ही परिवार में सबसे ज़्यादा छींटखोपर था। माँ को लगता रहता था कि इसका कुछ नहीं हो सकता । मन ही मन चिंतित रहती होगी , इसलिए मेरी अनुपस्थिति में उसने एक चलते- फिरते ज्योतिषी से संपर्क किया । ज्योतिषी ने कहा कि मुझ पर शनिचरा चढ़ा है। घोड़े की नाल की अँगूठी अगर पहना दी जाए तो मुझ पर से शनिचरा उतर जाएगा।
माँ ने अँगूठी बना ली। खेल-धूप कर घर आया तो माँ ने प्यार से अँगूठी पहनने को कहा। बारह- तेरह वर्ष का रहा हूँगा । उस वक्त भी देवता- देवी में मुझे कोई भरोसा नहीं था । यों दशहरा, काली आदि के मेले में जाता और दोस्तों के साथ खूब मजे करता।
मैंने न पूजा की , न कोई धार्मिक चिह्न धारण किया
मैंने माँ का चेहरा देखा । उनके चेहरे पर जो भाव था, उसे इंकार नहीं किया जा सकता था। मैंने उस वक़्त अँगूठी पहन ली , मगर शाम होते- होते अँगूठी उतर गई । तब से आज तक मैंने न पूजा की , न कोई धार्मिक चिह्न धारण किया ।
वैसे यह कोई बड़ी बात नहीं है। कोई भी यह काम कर सकता है, लेकिन आज भी लगता है कि इन सब से भविष्य सुधरता नहीं है और न ही परिस्थितियों के आकलन में मदद मिलती है।
मैं अपने वृहतर देश को देखता हूँ । लोगों से भरा हुआ देश । तब भी आह्वान कि और बच्चे जनमाओ । बढ़ती हुई आबादी और बदइंतज़ामी । सिस्टम लोगों को सँभाल नहीं पा रहा और न लोग सिस्टम को सँभाल पा रहे हैं।
सिस्टम की धज्जियाँ उड़ रही
सिस्टम की धज्जियाँ उड़ रही हैं । करोड़ों लोग सिस्टम में काम कर रहे हैं, लेकिन सिस्टम में कार्यरत लोगों द्वारा सामान्य परीक्षा भी संचालित नहीं हो पा रही। परीक्षा भी सेना करायेगी।
फिर विभिन्न विभागों में लोगों को क्यों काम कर रहे है और उन्हें क्यों वेतन दिया जा रहा है? वे लोग अपना काम ईमानदारी से क्यों संपादित नहीं कर पा रहे?
एक तो धीरे-धीरे सारे अधिकार केंद्र में सिमटते जा रहे हैं और केंद्र पूर्व के ही अधिकारों को सँभाल नहीं पा रहा । केंद्रीय स्तर पर फलाना परीक्षा होगी । क्यों होगी केंद्रीय स्तर पर? राज्य क्या करेगा?
सत्ता चलाने वाला भ्रष्ट अधिकारी – कर्मचारी ईमानदार रह ही नहीं सकते
आम नागरिकों के पैसे से कर्मचारी- अधिकारी- मंत्री- मुख्यमंत्री- प्रधानमंत्री पलते हैं । जज और तमाम लोकतंत्र के नौकर भी। फिर इतनी बेचैनी क्यों है?
मुझे लगता है कि सत्ता चलाने वाला भ्रष्ट होगा तो उसके अधिकारी – कर्मचारी ईमानदार रह ही नहीं सकते । जनता में अगर सांस्कृतिक चेतना सजग नहीं है, तो वह भी देखा- देखी भ्रष्टाचार के शिकार है।
देश में एक बार तूफ़ान आयेगा
जिस देश का बहुसंख्यक सत्ताधारी हिस्सा जेब काटने पर लगा हो , उस देश में बेचैनी बढ़ती ही जायेगी । यह बेचैनी तूफ़ान लायेगी या अंदर ही अंदर विस्फोट करेगी, कहा नहीं जा सकता।
मैं कोई ज्योतिष नहीं हूँ, लेकिन जीते और काम करते हुए लगता है कि देश में एक बार तूफ़ान आयेगा । वह तूफ़ान देश को बचायेगा , संबंधों में विश्वास और भरोसा पैदा करेगा या फिर छतों और महलों के कंगूरों को उड़ा देगा और संबंधों का कोई मतलब नहीं रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।
