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इन दिनों उदास बादलों का राग: आदमी को आदमी नहीं रहने दिया, उसे हमने सामान बना दिया — डॉ. योगेन्द्र

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इन दिनों उदास बादलों का राग: बादल आज भी है, पूरे वजूद के साथ, लेकिन बरस नहीं रहा है। आकाश से चूने की , उसकी भी टाइमिंग होगी । आकाश में घूमते – फिरते वह भी सोचता होगा कि इस धरती पर क्यों बरसूँ? लोग मरें तो मरें। वैसे भी कौन – से जीवित हैं? धरती पर कैसे कैसे नराधम हैं? एक बस पैंतालीस किलोमीटर चलती रहती है और एक नाबालिग़ युवती के साथ ड्राइवर, कंडक्टर सामूहिक रेप करता है। ड्राइवर, कंडक्टर या अन्य लोगों की चेतना क्या सुन्न पड़ गई है? अगर कोई स्वरा भास्कर औरत- मर्द के संबंधों पर कुछ अनसुनी व्याख्याएँ सुना जाती हैं तो कुछ लोग नैतिकता की टोकरी लेकर प्रवचन देने आ जाते हैं ।

स्वरा भास्कर जैसी सभी स्त्रियाँ हों जो बोलें। अपनी समझ और अपनी आवाज़ को स्वर दें। यह पुरुष समाज स्त्रियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार भी करता है और नैतिकता का पाठ पढ़ाने भी आ जाता है। बलात्कार के मामले में समाज की वह कौन सी दृष्टि है कि पीड़िता की इज़्ज़त चली जाती है और बलात्कारी की इज़्ज़त क़ायम रहती है? हाल के कुछ वर्षों में इसके भी उदाहरण मिलते हैं कि जब बलात्कारी जेल से छूट कर आता है तो उसे फूल- मालाओं से लाद दिया जाता है। आत्महत्या पीड़िता कर लेती है, लेकिन अपराधी आत्महत्या नहीं करता।

बादल बरस कर क्या करेंगे? भले वे आसमान की शोभा बढ़ा रहे हैं। इस धराधाम पर आदमी कितना विपन्न हो गया है। ऐसे ऐसे कुकर्म करता है और कुकर्म के बाद उसे डिफेंड भी करता है। आदमी को समता और बराबरी की तलाश नहीं है। वह गैर बराबरी में आनंदित है। परसों जब भागलपुर स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने आया तो अपनी नंगी आँखों से देखा।

चार- पाँच बरस तीन- चार बच्चे सामूहिक रूप से भीख मांग रहे हैं। थोड़ी दूर आगे बढ़ा तो हाथ पसारे एक औरत। सब कुछ चंगा है तो स्टेशनों पर आदमी नंगा क्यों है? विकास दर आसमान छू जाए । कुछ धनपशुओं के पास अकूत संपत्ति हो जाए तो मानवता को क्या अंतर पड़ता है? हम एक भूखे- नंगे समय में रह रहे हैं। भूख और नंगई सिर्फ़ शरीर तक सीमित नहीं है।

इसने आत्मा तक को दबोच लिया है। मनुष्य की आत्मा कितनी खोखली हो गई है! लोगों ने देखा नेपाल में बाढ़ की तबाही और यह भी देखा कि कुछ लोग उफनती नदी में बहती लाशों से गहने उतारते और सामान लूटते हुए। ग़रीब होना उतना बुरा नहीं होता, लेकिन दरिद्र होना मनुष्य की गिरावट की पराकाष्ठा है।

हम जो समाज बना रहे हैं, उसमें बुनियादी चूक हुई है। आदमी को आदमी नहीं रहने दिया, उसे हमने सामान बना दिया है। चिड़िया चिड़िया रह जाती है, लेकिन आदमजात आदमखोर भी बन जाता है। उसके रुपों का कोई ठौर नहीं। आदमी में सृष्टि के सभी रूप मौजूद हैं। वे प्राणियों में श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन प्राणियों में सबसे निकृष्ट भी माना जाना चाहिए । उसमें दोनों संभावनाएं हैं – श्रेष्ठता की भी और निकृष्टता की भी।

समाज की रचना में ही दोष है। पढ़ाई में भी समता का पाठ नहीं है। जीवन में भी समत्व- भाव नहीं है। हाथ में गीता या क़ुरान लेने से समत्व भाव क़ायम नहीं हो सकता। सिद्धांत में ऊँचाई और व्यवहार में गिरावट अभूतपूर्व है।

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