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न्यायपालिका उतार पर है: डॉ. योगेंद्र ने न्यायिक व्यवस्था और जजों के फैसलों पर उठाए सवाल
न्यायपालिका उतार पर है
मौसम पर अर्नब तूफ़ान का असर है। दो दिनों से बच्चे मजे ले रहे हैं। उन्हें स्कूलों से फुर्सत मिल गई है। कल से ही आकाश पनियाया हुआ है। आज सुबह से बारिश हो रही है। हर रोज़ की तरह आज भी टहलने निकला । कुर्ते के ऊपर रेनकोट चढ़ा लिया था। अलका ने छाता थाम लिया । सड़क पर पूरा सन्नाटा था। सभी घरों में दुबके थे। यहां तक कि चिड़ियों का पता न था। हर दिन सैकड़ों चिड़िया छतों पर, तारों पर या झाड़ियों में मौजूद रहती थीं। आज एक भी नहीं है।
थोड़ा भय लग रहा
मौसम के बिगड़ने का अंदेशा उसे होता है। बारिश के दिनों में वे अपने घोंसलों से निकल आती हैं। लेकिन अभी ठंड के साथ अर्नब तूफ़ान है, इसलिए वे बाहर नहीं आये। जाते हुए बारिश से थोड़ा भय लग रहा था। दो दिनों से कभी पीठ तो कभी बाजुओं के नीचे दर्द हो जाता है। बदलते मौसम में कब ठंड भीतरघात कर बैठती है, पता नहीं चलता। आगे बढ़ा तो भय तिरोहित हो गया और मौसम का लुत्फ उठाने लगा। सूनी सड़क पर धारासार बारिश, बंद दुकानें , छपछपाते जूते और मन की उड़ान। लौटते वक्त पहले सर्वभक्षी दो कौए दिखाई पड़े। फिर आसमान में बगुले। बारिश वैसी ही होती रही, जाते हुए भी और आते हुए भी। बेमौसम बारिश से धान की फ़सल चौपट हो रही है।
बेमौसम पटरी पर से उतरी हुई ट्रेन
बेमौसम पटरी पर से उतरी हुई ट्रेन है। अंततः इससे लोग ही क्षत- विक्षत होते हैं। देश में मौसम और राजनीति- दोनों बिगड़ गये हैं। न्यायपालिका भी उसकी चपेट में है। न्यायमूर्ति अपने कक्ष से चंपत हो रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकीलों ने गरदा उड़ा दिया। टेबुल कुर्सी सब उलट पुलट कर ज़िंदाबाद और मुर्दाबाद के नारे लगे । जज कभी कभी अपने को सुप्रीम समझने लगते हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब तक आप संविधान के दायरे में काम कर रहे हैं तभी तक सुप्रीम है। न्यायपालिका को अपनी इज्जत बचानी है तो उसे सतर्क रहना चाहिए। ऊलजलूल वक्तव्य और फ़ैसले आने वाले दिनों में महंगे पड़ने वाले हैं।
प्रदर्शनकारियों को मख्खी कहने वाले जज संविधान की इज्जत नहीं करते
बेरोज़गारों को कॉकरोच और प्रदर्शनकारियों को मख्खी कहने वाले जज संविधान की इज्जत नहीं करते। उनके अंदर एक निकृष्ट सामंत जीवित है। यह इसलिए हुआ है कि हमने औपनिवेशिक सिस्टम अपना लिया है। जज के दिमाग में या तो मनुस्मृति है या औपनिवेशिक सत्ता का संस्कार। नतीजा है कि उनकी सुविधा, बोली, चाल चलन जनविरोधी प्रतीत होते हैं। स्वतंत्र देश की यह न्यायपालिका नहीं है। अगर यह न्यायपालिका नागरिक को कहती है कि मतदाता सूची में नाम नहीं था, कोई बात नहीं। इस साल वोट नहीं दिया, अगले साल वोट कर लेना। इतनी लापरवाही आती कहाँ से है? न्यायालय अगर मुंह देख कर फ़ैसला करने लगे तो फिर न्यायालय का सम्मान कोई क्यों करेगा? स्वतंत्र भारद्वाज और पिंकी चौधरी नामक दक्षिणपंथी गुंडे प्रदर्शनकारियों को पीटते हैं।
न्यायपालिका की कोई हैसियत नहीं
वीडियो बनाते हैं। पुलिस के सामने तमाशा करते हैं, लेकिन उसे कोर्ट तुरंत ज़मानत दे देती है और प्रदर्शनकारियों को न केवल जेल में रखती है, बल्कि पीस बांड भरवाती है। लोग यह तमाशा देखते हैं। वे भी जज तो जज करते हैं। उनकी नज़र में न्यायपालिका की कोई हैसियत नहीं रहती। दरअसल कोर्ट से नाउम्मीद हुए लोग उम्मीद करते हैं। उनकी उम्मीद टूटती है तो कोर्ट अपना औचित्य खोता जाता है।
