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OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सुझाव: IAS दंपति की संतान को आरक्षण लाभ क्यों मिले?

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क्रीमी लेयर को परिभाषित करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। अदालत ने बहस के दौरान सवाल उठाया कि यदि माता और पिता दोनों ही अफसर हैं, तब उनकी संतान को आरक्षण कोटे का लाभ क्यों मिलना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे परिवारों के बच्चों को लगातार आरक्षण का लाभ मिलता रहा, तो समाज इस दुष्चक्र से कैसे बाहर निकलेगा?

आरक्षण का उद्देश्य और क्रीमी लेयर की अवधारणा

भारतीय समाज में जातियों के आधार पर लंबे समय तक उच्च जातियों को विशेषाधिकार प्राप्त रहे हैं। इसी ऐतिहासिक असमानता को कम करने के लिए वंचित और पिछड़े समुदायों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिया गया। इसे विशेष अवसर और लोकतांत्रिक अधिकार के सिद्धांत के रूप में देखा जाता है।

हालांकि, आरक्षण की सुविधा का लाभ लेकर पिछड़े वर्गों के भीतर भी कुछ परिवार प्रभावशाली और प्रभुत्वशाली बन गए हैं। इसी स्थिति को संतुलित करने के लिए क्रीमी लेयर की अवधारणा लाई गई।

इस अवधारणा का उद्देश्य आरक्षण के मूल मकसद को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे अधिक न्यायसंगत और विवेकपूर्ण बनाना है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्या है?

न्यायाधीशों ने बहस के दौरान कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में जो परिवार सामाजिक-आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर होने पर विचार किया जा सकता है।

अदालत के समक्ष यह सुझाव भी सामने आया कि IAS पति-पत्नी की संतान को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

इस विचार को आरक्षण विरोधी कदम नहीं, बल्कि पिछड़े वर्गों के भीतर अवसरों के अधिक न्यायपूर्ण वितरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

याचिकाकर्ता की दलील क्या थी?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग और पिछड़े वर्गों के क्रीमी लेयर परिवारों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।

ज्ञात हो कि OBC आरक्षण में विभिन्न राज्य सरकारों ने पहले से ही क्रीमी लेयर की आर्थिक सीमा निर्धारित कर रखी है। तय सीमा से अधिक आय या आर्थिक हैसियत वाले परिवारों को आरक्षण लाभ नहीं दिया जाता।

इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता दोनों के उच्च प्रशासनिक पद पर होने की पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

सुझाव, फैसला नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण नीति बनाना सरकार और विधायिका का क्षेत्राधिकार है।

कर्नाटक हाईकोर्ट से जुड़े मामले में याचिकाकर्ता राघवेंद्र फकीरप्पा चंद्रनवर ने ऐसे परिवारों की संतानों को आरक्षण से बाहर करने का समर्थन किया था।

22 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने OBC क्रीमी लेयर को लेकर यह महत्वपूर्ण सुझाव दिया।

SC/ST में क्रीमी लेयर पर भी बहस

इससे पहले एक अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में भी क्रीमी लेयर को लेकर सुझाव दिया था।

हालांकि, बाद में केंद्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया था कि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू नहीं की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं भी कहा था कि अदालत की टिप्पणियां सरकार के लिए बाध्यकारी निर्देश नहीं, बल्कि सुझाव हैं।

बिहार, जाति सर्वेक्षण और आरक्षण का सवाल

जाति जनगणना के बाद बिहार विधानसभा ने सभी दलों के समर्थन से आरक्षण सीमा 50% से बढ़ाकर 65% करने का प्रस्ताव पारित किया था।

लेकिन बिहार हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि आरक्षण सीमा को 50% से बढ़ाकर 65% नहीं किया जा सकता। इस प्रस्ताव को राष्ट्रपति की मंजूरी भी नहीं मिली।

सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा टिप्पणी इस बात पर जोर देती है कि आरक्षण व्यवस्था को केवल ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।

आरक्षण का विवेकीकरण या OBC राजनीति पर असर?

विश्लेषण में यह भी स्वीकार किया गया है कि जातीय गोलबंदी में अक्सर अपने प्रभावशाली वर्गों को अलग करने से बचा जाता है। यह आशंका भी जताई जाती है कि कहीं क्रीमी लेयर के नाम पर OBC खेमे को कमजोर करने की रणनीति न अपनाई जाए।

इसलिए, आरक्षण व्यवस्था में सुधार के नाम पर कोई बेतुका तरीका अपनाने से बचने और लगातार सर्वेक्षण, समीक्षा तथा जातीय-सामाजिक स्थिति के अध्ययन की जरूरत पर जोर दिया गया है।

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