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पढ़े फ़ारसी, बेचे तेल: शिक्षा का उद्देश्य नौकरी या वैज्ञानिक सोच? डॉ. योगेन्द्र का लेख

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डिजिटल डेस्क: ओशो रजनीश का नाम तो आपने सुना होगा। वे एक बार एक डॉक्टर के घर रुके हुए थे। डॉक्टर से उनकी ज्ञान-विज्ञान की बातें होती रहीं। जब दस बज गए तो काम पर जाने के लिए डॉक्टर उठे। वे दरवाज़े की ओर ज्यों ही बढ़े कि उनकी बेटी ने छींक दी। डॉक्टर काम पर जाने के बजाय वापस लौट आए।

संयोग ऐसा कि जब भी डॉक्टर काम के लिए दरवाज़े की ओर जाते, उनकी बेटी छींक देती। डॉक्टर बार-बार लौट आते। यह देखकर रजनीश ने पूछा—”क्या बात है? तुम बार-बार क्यों लौट रहे हो?”

डॉक्टर ने कहा, “देखते नहीं हैं, बेटी बार-बार छींक देती है। जाने से रास्ते में अपशगुन होगा।”

इस पर रजनीश बिगड़ गए। बोले—”तुम डॉक्टर हो। तुम्हें पता है कि छींक क्यों आती है? फिर भी तुम वाहियात चीज़ों में भरोसा करते हो? तुम डॉक्टर भले हो गए हो, मगर डॉक्टर का टेम्परामेंट नहीं है।”

मुझे यह कहानी इसलिए याद आ गई, क्योंकि कल जौनपुर में डॉक्टरों का एक समूह भगवान जगन्नाथ की सेहत जाँच करने मंदिर गया था। उन्होंने बाक़ायदा आला लगाकर भगवान जगन्नाथ की धड़कनों को जाँचा।

पढ़े-लिखे डॉक्टर जब अंधविश्वास को समाज में परोसते हैं, तो डॉक्टरों की पढ़ाई-लिखाई पर गहरे सवाल उठते हैं। साइंस में डिग्री हासिल करने के बाद भी यदि उसकी चेतना वैज्ञानिक नहीं हुई तो फिर साइंस पढ़ने का फायदा क्या?

मैंने पूरी ज़िंदगी पढ़ने और पढ़ाने में खर्च कर दी, तब भी मन में सवाल उठता रहता है कि आखिर शिक्षा का उद्देश्य क्या है?

सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे हैं। राहुल गांधी ‘छात्रों की गूँज’ नामक कार्यक्रम कर रहे हैं। सोनम वांगचुक की ज़िद है कि चूँकि नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक हुए हैं, इसलिए सरकार इसकी ज़िम्मेदारी ले और शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें। राहुल गांधी कह रहे हैं कि एजुकेशन सिस्टम सड़ गया है, इसलिए इसे बदलना ज़रूरी है।

बीजेपी सरकार लाखों सरकारी स्कूलों को बंद कर चुकी है और पूँजीपतियों के समूह शिक्षा में दख़ल दे रहे हैं। उन्हें लगता है कि शिक्षा उद्योग में मुनाफ़ा बहुत है। वे जगह-जगह महंगे स्कूल खोल रहे हैं। सरकारी विश्वविद्यालयों को बेदखल करने के लिए निजी विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं।

कहीं भी स्कूल खोल दें तो बच्चों की कोई कमी नहीं है। यहाँ तक कि कोचिंग संस्थानों में बच्चे उमड़ पड़ते हैं। यानी बच्चों में पढ़ने की ललक है और अभिभावकों के अंदर बच्चों को पढ़ाने की चाहत।

दूसरी तरफ यह भी सच है कि करोड़ों पढ़े-लिखे लोग बेरोजगार हैं। उन्हें जीवन जीना मुश्किल हो रहा है। उनमें से बहुत लोग आत्महत्या कर लेते हैं। यानी जो शिक्षा चल रही है, उसने बच्चों को जीने का सलीका नहीं सिखाया। पढ़-लिखकर अगर वे जीवन जीने लायक़ नहीं हैं तो फिर पढ़ाई का क्या मतलब?

गांव-देहात में एक कहावत प्रचलित है—”पढ़े फ़ारसी, बेचे तेल, देखो यह दुनिया का खेल।”यानी अगर आपने पढ़ लिया तो तेल बेचने जैसे रोज़गार नहीं कर सकते।

बच्चों और अभिभावकों—दोनों को लगता है कि पढ़-लिखकर नौकरी नहीं मिली तो पढ़ाई बेकार है। यानी यह बात चेतना में गहरे धँस गई है कि पढ़ाई का कुल मतलब नौकरी है।

नौकरी मिल गई तो बल्ले-बल्ले, नहीं मिली तो ज्ञान, करुणा, संवेदना और सृजनशीलता जाए जहन्नुम में।

नौकरी और रोज़गार के बिना अभिभावक भी परेशान हैं और बच्चे भी। सरकार लाखों पदों को नहीं भरकर अपराध कर रही है और बच्चों को भड़का रही है।

तब भी इतना भर मुझे ज़रूर लगता है कि मनुष्य शरीर और चेतना से बना है, तो शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो शरीर को पुष्ट करे और चेतना को परिष्कृत।

आप और आपके बच्चे भी शिक्षा में कार्यरत होंगे। आप भी सोचें, शिक्षा कैसी होनी चाहिए?

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