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‘संसद की ऐसी तैसी’: डॉ. योगेन्द्र का बेबाक लेख, नई संसद और गिरते राजनीतिक विमर्श पर तीखा सवाल

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संसद की ऐसी तैसी – डॉ योगेन्द्र अद्भुत उत्साह- उमंग , हँसी-ख़ुशी और आमोद- प्रमोद था, उस दिन जब नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री बन कर संसद की सीढ़ियों पर दंडवत् कर रहे थे। लग रहा था कि संसद का मान- सम्मान आसमान छुएगा, लेकिन क्या पता था कि पहले पुरानी संसद ग़ायब हो जाएगी और बारह साल बाद खुद मोदी जी संसद आने से कतराने लगेंगे। पुरानी संसद नरेंद्र मोदी जी को रास नहीं आई और एक निर्धन मुल्क में जिसकी अस्सी प्रतिशत आबादी पाँच किलो अनाज पर पल रही हो, उन्होंने बीस हज़ार करोड़ में नयी संसद बनवाई। नयी संसद बनी , उद्घाटित हुई, लेकिन बहस का स्तर गिरता चला गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में कैरिकेचर करने लगे और उनके इस घटिया रवैये पर बीजेपी के सभी सांसद ठहाके लगाते रहे। संसद तो विमर्श का माध्यम थी। जहाँ देश की समस्याओं पर बहस होती है और नये- नये क़ानून बनते हैं, लेकिन संसद में एक – दूसरे को चिढ़ाने, कटाक्ष करने और यहाँ तक कि गाली देने का माध्यम बनती गई। हाल में भारत के युवाओं ने पेपर लीक के खिलाफ आवाज़ बुलंद की तो प्रधानमंत्री ने पेपर लीक से संबंधित नये बिल की घोषणा की। देश के लिए आश्चर्य और दुख की बात यह थी कि जब इस बिल पर संसद में बहस हो रही थी तो वे अनुपस्थित रहे। बात यहीं नहीं रुकी । वंदे मातरम को अनिवार्य करने के लिए राज्यसभा में बिल पेश हुआ। सूत्रों के अनुसार यह बिल गृह मंत्री को पेश करना था, लेकिन वे भी इस अवसर पर मौजूद नहीं थे, जबकि इस वंदे मातरम बिल को बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह संसद में क्यों नहीं आ रहे?

हालात इतने बुरे हो गये कि राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने ग़ुस्से में यहां तक कह दिया कि कहाँ हैं गृहमंत्री? उन्हें खींच कर लायेंगे और जनता को सौंप देंगे। पूरा विपक्ष यह सवाल करने लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह संसद में क्यों नहीं आ रहे? आश्चर्य की बात यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रात के ग्यारह- बारह बजे रील बनाते रहे , लेकिन संसद में आकर कोई बयान नहीं दिया। प्रधानमंत्री संसद के नेता होते हैं। उनकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी संसद के प्रति है। जब वे अनुपस्थित रहने लगे तो संसद परिसर में तमाशे होने लगे। सत्ता पक्ष और विपक्ष कभी हाथों में तख्तियां लिए एक – दूसरे के खिलाफ नारे लगाते तो कभी वे जुलूस की शक्ल धारण कर लेते । हद तो तब हो गयी, जब निर्दलीय सांसद पप्पू यादव साधु का भेष धारण कर संसद आ गए। संसद परिसर में बैठ कर उन्होंने चंदाचोरी का स्वाँग रचा। विपक्ष के नेता इस खेल में शामिल हुए। यह दृश्य हास्य तो प्रकट करता था, लेकिन संसद की गरिमा के अनुकूल नहीं था। इससे पूर्व सपा के सांसद चंदा जमा करने वाले डिब्बे को माथे पर लेकर घूम चुके थ।

सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के दुश्मन बने

सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। इस अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की याद आती है। उन्होंने संसद में एक वाक़या सुनाया। उन्होंने कहा कि जब मैं प्रधानमंत्री बना तो संसद की गैलरी में लगायी गई नेहरू की तस्वीर हटा दी गई तो मैंने पूछा कि नेहरू जी की तस्वीर कहाँ चली गई? किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन नेहरू की तस्वीर वहां टाँग दी गई। नेहरू से वैचारिक मतभेद रहते हुए भी दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे। सांसदों को याद रखना चाहिए कि संसद लोकतंत्र का मंदिर है। उसकी गरिमा की रक्षा करना हर सांसद का दायित्व है। संसद में लोकतंत्र की आत्मा बसती है। इसका इस्तेमाल जनता के दुख दर्द को उजागर करने के लिए होना चाहिए । इसे डॉ राममनोहर लोहिया के एक प्रसंग से समझना चाहिए। डॉ लोहिया 13 अगस्त 1963 को पहली बार संसद पहुँचे तो अंग्रेज़ी अख़बारों ने लिखा कि चीनी बर्तनों की दूकान में एक सांड घुस आया है। डॉ लोहिया के पूर्व संसद शांत थी। कोई सांसद ढंग से सवाल नहीं करता था । डॉ लोहिया ने पहली बार नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया और नेहरू को इस बात के लिए तीखी आलोचना की कि 27 करोड़ जनता हर रोज़ तीन आने पर गुजर बसर करती है और प्रधानमंत्री एक दिन में पच्चीस हज़ार रुपए खर्च करते हैं । यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि देश की आबादी चालीस करोड़ के आसपास थी। आज प्रधानमंत्री से कोई ऐसा सवाल नहीं करता। अच्छे दिन लाने और मुल्क की चौकीदारी का दावा करनेवाले प्रभु श्रीराम के मंदिर की भी रक्षा नहीं कर पा रहे। संसद की ऐसी की तैसी तो हो ही रही है।

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