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वचनवीरों के लहूलुहान वचन | डॉ. योगेन्द्र का तीखा प्रहार

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वचनवीरों के लहूलुहान वचन: देश के मौजूदा हालात, राजनीति के तौर-तरीकों, गाय के नाम पर होने वाले खेल और नदियों की दुर्दशा को लेकर जाने-माने चिंतक डॉ. योगेन्द्र ने तीखा प्रहार किया है। उनके मूल विचार और विश्लेषण नीचे दिए जा रहे हैं:

बीजेपी के नेताओं ने गाय का तमाशा बना दिया

बीजेपी के नेताओं ने गाय का तमाशा बना दिया। वर्षों बरस से उनके लिए गाय वोट का साधन थी। मुसलमानों ने जब से ऐलान किया कि गाय की क़ुर्बानी से बहुत दिक़्क़त है तो हमलोग गाय की क़ुर्बानी नहीं देंगे, आप गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दें; बीजेपी नेताओं को यह सुन कर लकवा मार गया। उनकी जान साँसत में। गाय राष्ट्रीय पशु हो जायेगी तो उनकी पशुता जो हिलोरें मारती हैं, उनका क्या होगा? वोट को जुगाड़ने का एक महत्वपूर्ण साधन छिन जायेगा। वे तो यों ही टौआने लगेंगे, क्योंकि उन्हें और कुछ आता नहीं। इसके अलावे जहाँ भी हाथ दिया, बंटाढार ही किया। ज़्यादातर बीजेपी नेता गाय नहीं पालते।

कृषि सभ्यता की रीढ़ और बछड़े का अभिशाप

गाय कृषि सभ्यता की रीढ़ थी। किसानों और पशुपालक जातियों के बीच पलती थी। गाय दूध देती थी और उनके बछड़े हल चलाते थे। उनके गोबर खाद बनते थे। कृषि की रीढ़ तोड़ दी गई। गाय वहाँ बेमतलब हो गई। खेतीबाड़ी से हल की ज़रूरत ख़त्म हुई तो बछड़े बेकार हो गए। जो किसान भगवान से प्रार्थना करते थे कि हे भगवान, हमारी गाय बछड़ा दे, वे कहने लगे कि अब बछड़ा नहीं, बछिया दे। बछड़ा अभिशाप हो गया। लोग बछड़े को या तो बेचने लगे या सांड बनाकर यों ही छोड़ दिया। ऐसे आवारा सांड उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव में मुद्दा बन गया था।

जब खेतीबाड़ी में गाय की भूमिका कम हुई तो गाय के दो उपयोग हुए- एक, उनका व्यापार शुरू हुआ और दूसरे, उनकी राजनीति में ज़बर्दस्त इंट्री हुई। देशी गाय की जगह जर्सी गाय आ गई। महान नेताओं ने कहा कि जर्सी गाय माता नहीं होती, देशी गाय माता होती है। जर्सी गाय की लूटपाट कर सकते हैं। उनके मारने – काटने से माँ नहीं कटती। बंगाल में जब पेचीदगी उत्पन्न हुई तो महान मुख्यमंत्री ने गाय की माँ बने रहने की उम्र तय कर दी। उन्होंने कहा कि गाय चौदह वर्ष तक माँ रहेगी, फिर वह सब्ज़ी – भाजी हो जाएगी। असम के मुख्यमंत्री ने कहा कि घर में काटो- खाओ, कोई दिक़्क़त नहीं है।

प्राण जाए पर वचन न जाई… अब वचन सिसकियाँ भर रहा है

कभी भारतीयों को इस रूप में सम्मान प्राप्त था कि भारतीय अपनी बात के पक्के होते हैं। चाहे गर्दन कटे या ख़ून बहे- मगर बात से पीछे नहीं हटेंगे। प्रचलित हुआ- प्राण जाए पर वचन न जाई। अब लोग कहते हैं कि वचन का क्या अचार डालेंगे। जान रहेगी तो जहान रहेगा। बेचारा वचन, सिसकियाँ भर रहा है। प्रधानमंत्री वचन देने में नहीं चूकते। उन्होंने हर राज्य को नंबर वन बनाने का वचन दिया है। देश को बदलने के लिए वचनों की झड़ी लगा दी है। वे अद्भुत वचनवीर हैं।

अद्भुत आईडिया: नाले की गैस से चाय की तकनीक

इतनी बात तो माननी पड़ेगी कि उनका दिमाग़ फरटाइल है। वे देश को बंजर कर दें, लेकिन उनके दिमाग़ में अद्भुत आईडिया आता है। गणेश जी के माध्यम से सर्जरी विद्या का उद्घोष किया तो नाले की गैस से उन्होंने चाय की तकनीक बताई। पता नहीं, प्रधानमंत्री के ऐसे सद्विचार पर अभी तक नीति आयोग ने कोई योजना क्यों नहीं बनाई? देश में गैस की किल्लत है। चार सो का सिलेंडर हज़ार पार कर चुका है। प्रधानमंत्री की इस तकनीक की आज बहुत ज़रूरत है। हमारे प्रधानमंत्री की डिग्री पर जो संदेह है, मगर हैं तो गुनिया आदमी।

नदियों का देश नहीं, नालों का देश होगा भारत!

प्रधानमंत्री जानते हैं कि देश में और कुछ की कमी हो, मगर नालों की नहीं है। शहर तो शहर, गांव- घर भी नालों में डूबते रहते हैं। यहां तक कि यमुना- दामोदर नाला बन चुकी है। गंगा नाला बनने के लिए तत्पर है। प्रधानमंत्री ने भारत का भविष्य देख लिया था। यह देश नदियों का देश नहीं, नालों का देश होगा। इसलिए नालों के उपयोग के लिए उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी तकनीक का ईजाद किया। देश के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों को उनकी तकनीक पर काम करना चाहिए। आख़िर वे देश के प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री यों ही बतक्कड नहीं होते!

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