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रांची की बारिश से बचपन की यादों तक: मुड़ मुड़ कर न देख | डॉ. योगेन्द्र

Ranchi ki barish se bachpan ki yaadon tak
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रांची की बारिश से बचपन की यादों तक: राँची रेलवे स्टेशन पर जब कल उतरा तो बारिश की बूँदों की लहक से मुलाक़ात हुई। भागलपुर में बादल लगभग जानकीवल्लभ शास्त्री के मेघों की तरह था – ‘ओ पागल बादल व्यर्थ गगन मँडराता है / इतराता इतना सूखे गर्जन- तर्जन पर, / झूम झूम कर निर्जन में क्या गाता है? ‘ भागलपुर के बादलों का आसमान में चकल्लस है। सिर्फ़ टहला मारना है। बरसना नहीं है। अलबत्ता एक तो वह आसमान से ग़ायब रहता है और आता भी है, तो अपना रस बरसाता नहीं है।

रांची के बादलों की आदत अलग है। थोड़े से भी बादल आकाश के किसी कोने में आये तो बरसने का अंदेशा रहता है। यहां तो बादल ऐसे बरसता है,  जैसे निराला के बादल- राग नामक कविता में वर्णित है- धँसता दलदल,/ हँसता है नद खल्-खल्/ बहता, कहता कुलकुल कलकल कलकल।/ देख-देख नाचता हृदय/बहने को महाविकल-बेकल,/ इस मरोर से—इसी शोर से—/सघन घोर गुरु गहन रोर से/ मुझे—गगन का दिखा सघन वह छोर!/ राग-अमर! अंबर में भर निज रोर!

बारिश की बूँदों में नहाते पेड़

स्टेशन से घर तक आने में पुल- पुलिया, मैदान और खेतों में पानी ही पानी । बारिश की बूँदों में नहाते पेड़। घरों पर बूँदों की रोर। इच्छा हुई थी कि घर पहुँच कर छत पर भीगने चला जाऊँगा। बचपन में इच्छा होती थी कि बारिश में भींगने के लिए दौड़ जाता था। उस वक़्त ज़्यादातर घर की छतें खपडे की होती थी। वर्षा गिरते ही ‘ओहारी’ ( छत का अंतिम छोर) चूने लगती और हम बच्चे उसमें खूब नहाते।

बिहार में लगता है कि बारिश बहुत कम हो गई है। पहले सात- सात दिन लगातार बारिश होती थी। पानी तभी उखेलता ( ख़त्म ) था, जब सप्ताह भर बाद वह दिन लौटता जिस दिन बारिश शुरू हुई थी। मौसम ठंड से भर जाता। चादर तक निकल आती। अब कहाँ वह बरसा! किसान स्वर देता है- बरखा रानी, झूम कर बरसो। मगर रानी तो रूठ गई है।

आज घूमने निकला तो आकाश में बादल मौजूद था। हाथ में छाता रख लिया । नाले और पुलिया में हर- हर पानी बह रहा था। लगभग महीने भर बाद आया था। रास्ते वही थे । मन में तरह-तरह के विचार।

लोगों को कंप्यूटर पर बहुत गर्व है

लोगों को कंप्यूटर पर बहुत गर्व है, लेकिन अभी भी मानव- मस्तिष्क का सामना नहीं कर सकता। वैसे एक बार शतरंज के बेताज बादशाह गैरी कास्परोव को 1996 में आईबीएम के सुपर कंप्यूटर डीप ब्लू के साथ मुकाबला हुआ था जिसमें सुपर कंप्यूटर जीत गया था। लेकिन आम आदमी के दिमाग से कोई नहीं जीत पायेगा।

घर से सड़क तक आने के क्रम में एक स्थल पर बिजली के तारों पर एक छोटी चिड़िया चीं चीं करती मिलती थी। आज वह नहीं थी। कहाँ गई होगी? एक महीने में ही उसने अपना ठिकाना बदल लिया?

रास्ते में पुटुष के फूल वैसे ही थे। स्कूल बसों का आना जाना भी वैसे ही। हर सड़क की एक रिद्म होती है। कुछ दिन रहते रहते, चलते- चलते समझ में आता है। लोगों के चेहरे, घर, खेत और जीव- जंतु – आँखों में ठहर से जाते हैं।

जीवन में कितनी चीज़ें दायरे में आती हैं और फिर छूटती चली जाती हैं। एक तरह से कह सकते हैं कि छूटना जीवन का महत्वपूर्ण क्रिया है।

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