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डॉ. योगेन्द्र का लेख: ‘पीर पर्वत सी हो गई’—युवा आंदोलन, जंतर-मंतर और सरकार पर तीखा हमला
डॉ. योगेन्द्र
डॉ. योगेन्द्र का लेख: ‘पीर पर्वत सी हो गई’: घर में बैठे- पढ़ते- लिखते मैं बहुत उत्साहित हूँ। जंतर- मंतर पर सरकार के ख़िलाफ़ युवा आक्रोश गानों, गीतों और नारों में व्यक्त हो रहा है। गर्मी बहुत है तो युवा एक-दूसरे के लिए ताड़ के पंखे चला रहे हैं । उनके सहयोग, समर्थन, उनके चमकते चेहरे और सत्ता के खिलाफ गुस्सा आशा और उम्मीद दिलाते हैं । वैसे कुछ लोगों का मानना है कि यह सत्ता द्वारा ही प्रायोजित है। उसे युवाओं के ग़ुस्से को डायवर्ट करना है,इसलिए यह आंदोलन प्रायोजित किया है। कई अवसर ऐसे भी आए कि लगा कि सरकार आंदोलन को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है। राजनीति की दुनिया में ऐसा बहुत कुछ होता है जिसका पता हमें नहीं होता, लेकिन यह भी सच है कि सभी कुछ का नियंत्रण न सरकार कर सकती है, न साज़िश । जब जनता की बाढ़ आती है तो साज़िश की आँतें फट जाती हैं । सरकार अगर अपने ख़िलाफ़ नारे लगाने के लिए सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके को चुना है तो युवा अब सरकार और उसके कुकर्मो को चुन लिया है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के नारे अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े में बदल गया है। देश के विभिन्न इलाक़ों से युवा और लोग जंतर-मंतर पर आये हैं। जो नहीं पहुँच पाये हैं, वे अपने अपने शहरों में प्रदर्शन कर रहे हैं । यह आंदोलन अब सिर्फ़ दिल्ली तक सीमित नहीं है। वह कई राज्यों में फैल गया है। प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार , मध्य प्रदेश, बंगाल, झारखंड आदि राज्यों की राजधानियों और नगरों में प्रदर्शन हो रहे हैं।
पीर पर्वत सी हो गई, अब हिमालय से गंगा निकालने का वक्त
इतनी बात ज़रूर है कि प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री आदि पार्टी तोड़ने के अपने प्रिय काम में लगे हैं। उन्हें लगता है कि यह आंदोलन टाँय- टाँय फिस्स हो जाएगा । उसने अन्ना आंदोलन का बख़ूबी इस्तेमाल किया है। सत्ता विरोध में उठी लहर को उसने बेहतरीन ढंग से भुनाया है। उस वक्त के नरेंद्र मोदी जी के भाषण को सुनिए तो लगेगा कि वे कितने बड़े क्रांतिकारी हैं । वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से ऐसे सवाल कर रहे थे कि लगता था कि मनमोहन सिंह निरा मूर्ख हैं और उन्होंने ही देश को बर्बाद कर रखा है। उस वक्त ऐसा लगता था कि नरेंद्र मोदी के पास हर समस्या का हल है और अगर वे प्रधानमंत्री बन गये तो स्वर्ग भारत की धरती पर उतर आएगा। युवाओं की सत्ता विरोधी लहर को उन्होंने ‘अच्छे दिन आयेंगे’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ में बदल दिया और वे गद्दी पर आसीन हो गये। बाद में समझ में आया कि यह आदमी बातों का जादूगर था। इसे कुछ आता- जाता नहीं था। उसने गाल बजाने में महारत हासिल कर रखा था। नाले की गैस से चाय बनाने से लेकर कोरोना को थाली बजाकर भगाने के फर्जी हुनर का प्रचारक था। इसके कार्यकाल में सरहद से लेकर घर तक बर्बाद होता रहा । उसने मंदिर लूटने में परहेज नहीं किया और न देश लुटाने में ।उसने दुष्प्रचार किया कि सत्तर सालों में कुछ नहीं हुआ और सत्तर सालों में जो बनाया गया था, उसे वह बेचता रहा। हिन्दुओं का हितैषी बन कर हिन्दुओं को ही तंग तबाह किया और उसने देश के अंदर नफ़रत की आँधी पैदा कर चुनावी फ़सल काटता रहा।
यह बात हमें समझ लेनी चाहिए कि अन्ना आंदोलन के समय बीजेपी विपक्ष में थी और कांग्रेस सत्ता में। अभी हालात दूसरे हैं। युवाओं में जितना आक्रोश होगा, वह विपक्षी राजनीति को बल देगा, लेकिन हमें युवा आंदोलन से ज़्यादा उम्मीद है। वह महज सत्ता बदलने तक सीमित नहीं रहे । धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा मामूली बात है। हमें तो लोकतंत्र के पहिये जिस तरह से कीचड़ में धँस गये हैं, उसे निकालने और देश क भविष्य सँवारने में लगना है।
नोट: यह लेख डॉ. योगेन्द्र के व्यक्तिगत विचार हैं। विमर्श न्यूज इन विचारों का समर्थन या खंडन नहीं करता।
