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दुनिया एक सर्कस है: बूढ़े बादल, नशे और जिंदगी पर डॉ. योगेन्द्र की नजर

duniya ek sarkas hai dr yogendra
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दुनिया एक सर्कस है

सवा चार बजे जग गया था। दरवाज़े खोले मैंने। आसमान साफ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क पर अँधेरे और प्रकाश का मिलाजुला रूप था। मैं बरामदे की कुर्सी पर बैठ गया और स्वामी विवेकानंद की यूरोप यात्रा का संस्मरण पढ़ने लगा।

संस्मरण लिखते हुए वे समुद्री जहाज़ पर थे। उन्हें अपना देश याद आया। गंगा, पद्मा और दामोदर नदियाँ याद आयीं। उनके संस्मरण ने मुझे चौंकाया।

आज तक मैं जानता था कि नदियों के मुहाने पर रेत का जमने का कारण फ़रक्का बराज है। लेकिन वे फ़रक्का बराज बनने के पूर्व की गंगा और दामोदर का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि हुगली और दामोदर के मुहाने पर रेत है।

नदियों के स्वभाव को जानना आसान नहीं है।

संस्मरण पढ़ते हुए आकाश लाल होने लगा था। बादलों पर सूर्य की रोशनी पड़ रही थी और बादलों के किनारे रक्ताभ हो चला था। अँधेरा टूटने लगा था। माँ के शब्दों में – फरीछ होय गेलय।

सुबह की आदत और ठंडा दूध

2009 से ही सुबह सुबह फ्रिंज का ठंडा दूध पीता हूँ। पेट में घाव हो गया था। मुंह से एक दिन ढेर सारा ब्लड निकल आया था। स्टूल काला हो ही रहा था। डॉक्टर ने जाँच आदि कर दवा दी थी और सुझाव भी कि सुबह सुबह ठंडा दूध पी लीजिए। गैस नियंत्रित रहेगी।

टहलने के पूर्व ठंडा दूध पीना आदत में शामिल हो गया है।

टहलने के लिए आसमान में कटे-कटे उजले बादल थे। जल से भरे बादल तो समझ में आता है। उसके होने का औचित्य है। वह संसार को कुछ दे सकता है, लेकिन उजले बादल का क्या मतलब है?

जल देने की हैसियत न हो तो उसे कौन पूछेगा?

विमान भी जब आकाश में उड़ता है तो यात्री को उजले बादलों की अनेक बस्तियां नज़र आती हैं।

जल से भरे बादल युवा होते हैं और जलविहीन बादल बूढ़े।

बूढ़ा अपने होने का औचित्य समझ नहीं पाता। करोड़ों बूढ़े सिर्फ़ समय गुजारते हैं या मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं। ज़्यादातर निराश रहते हैं। डरे हुए या थके हुए।

इन बूढ़ों को नरेंद्र मोदी, जिनपिंग, पुतिन आदि से प्रेरणा लेनी चाहिए। वे बूढे हैं, लेकिन बंकर जैसी गाड़ियों में चलते हैं और देश चलाते हैं।

रोज़ की सैर और जीवन का हिस्सा बनते दृश्य

हर रोज़ एक ही रास्ते से टहलने के जाने के कारण घर, दरवाज़े, लोग, गायें, चिड़िया, खेत आदि जीवन के हिस्से हो गए हैं।

जिस फील्ड में जाता हूँ, वहाँ अक्सर शराब की ढेर सारी खाली बोतलें पड़ी रहती है। बिखरे हुए प्लास्टिक के ग्लास, चखना वाली प्लेटें और सलाई की तालियाँ।

सुबह सुबह कई लड़कियां फ़ुटबॉल खेलने आती हैं। ये लड़कियां जब देह गर्म करने के लिए चक्कर लगाती हैं तो शराब की बोतलों के पास ठहर जाती हैं और उन्हें किनारे झाड़ियों में फेंक देती हैं।

शराब का नशा तो कृत्रिम है। थके मन को शायद राहत पहुंचाती होगी, लेकिन समाज तो नशेडियों से भरा हुआ है।

किसी के पास सत्ता का नशा, किसी के पास पोजिशन का, तो किसी के पास जात का, किसी के पास धर्म का तो किसी के पास ज्ञान या संपत्ति का।

शराब का नशा तो चढ़ कर उतर जाता है, लेकिन अन्य तरह के नशे जब चढ़ जाता है तो उतरता नहीं है।

फील्ड में मुझे कोई पहचानता नहीं। इधर-उधर देखते, तरह-तरह ख़्यालों में डूबे पाँच चक्कर का इंतज़ार करता हूँ।

दुनिया एक सर्कस है। उस सर्कस के हम सब हैं भागीदार।

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