Sen your news articles to publish at [email protected]
हवा के नये झोंके से कुछ सवाल | डॉ योगेन्द्र
हवा के नये झोंके से कुछ सवाल
रांची में हूँ और वह भी कांके के इलाक़े में। गाँव में था तो कांके का नाम सुनता था। जब कोई अतिरिक्त बड़बड़ाता या लंबी फेंकता था तो उसे लोग कहते थे— कांके जाना ही क्या?
मेरे पड़ोस में एक व्यक्ति था जो सचमुच कांके रिटर्न था। ज़िंदगी भी कैसे-कैसे मोड़ लेती है। वह व्यक्ति एयरफोर्स में काम करता था। अचानक एक दिन उसका दिमाग़ चढ़ गया और उसने अपनी बंदूक़ से कई फ़ायरिंग कर दी। उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
मैंने उसे रस्सियों से बँधा देखा है। उसे कांके लाया गया। उसे दवा दी गई। फिर उन्होंने पूरी ज़िंदगी मस्ती में गुज़ारी। गर्मी के दिनों में वे ताश बहुत खेलते। मैंने भी उनके साथ ताश की पत्तियाँ फेंटी हैं।
हवा का एक झोंका आया और उनके जीवन को बदल दिया। क्या देश की फ़िज़ाओं में भी नयी हवा का झोंका आने वाला है?
पतरातू रोड और जुगाड़ बुद्धि का दृश्य
मैं पतरातू रोड पर हर सुबह टहलने जाता हूँ। लंबी-चौड़ी सड़कें हैं। गाड़ियों की रफ़्तार बहुत रहती है। सुबह कम गाड़ियाँ चलती हैं, लेकिन एक दृश्य मुझे हर दिन आकर्षित करता है।
एक मोटरसाइकिल के पीछे चार से आठ तक साइकिलें रस्सियों के सहारे जुड़ी रहती हैं। उन साइकिलों पर दोनों तरफ कोयले के बोरे लदे रहते हैं। साइकिल सवार सिर्फ़ हैंडिल संभाले रहता है।
यह कोई कृत्रिम मेधा का कमाल नहीं है। यह अनुभव सिद्ध लोक बुद्धि है। इसे जुगाड़ बुद्धि कहा जा सकता है।
सत्ता परिवर्तन या व्यवस्था परिवर्तन?
देश में बदलाव की जो हवा बहेगी, उसमें जुगाड़ बुद्धि बचेगी या नया रूप लेगी, यह बड़ा सवाल है।
समस्या यह है कि सत्ता बदलती है, लेकिन तरीक़े कमोबेश वही रहते हैं। हर बार व्यवस्था बदलने की बात होती है, लेकिन बदलाव केवल सत्ता तक सीमित रह जाता है।
एक बार फिर फ़िज़ाओं में बदलाव की गंध है। वह किस रूप में व्यक्त होगा, यह कहना कठिन है, लेकिन लोगों को अपनी राय स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए।
लोकतंत्र, नौकरशाही और आर्थिक व्यवस्था पर सवाल
यदि बदलाव होता है तो नौकरशाही कैसी होगी? आर्थिक व्यवस्था कैसी होगी? चुनाव प्रक्रिया कैसे संचालित होगी? शिक्षा, धर्म और संस्कृति का स्वरूप क्या होगा?
इन प्रश्नों पर स्पष्ट सोच विकसित करना आवश्यक है ताकि लोकतंत्र में वास्तव में लोक की आकांक्षाएँ पल्लवित-पुष्पित हो सकें।
विपक्ष, सरकार और वर्तमान हालात
लेख में कहा गया है कि पढ़े-लिखे लोग भी कई बार स्वार्थ और साज़िश के शिकार हो जाते हैं।
लेखक के अनुसार वर्तमान सरकार झूठे प्रचार और लफ़्फ़ाज़ी पर आधारित है तथा उसकी नीतियों के दुष्परिणाम आर्थिक संकट, बेरोज़गारी और महंगाई के रूप में दिखाई दे रहे हैं।
कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दिए जाने और आम लोगों पर बढ़ते दबाव का भी उल्लेख किया गया है।
निष्कर्ष
लेख का केंद्रीय प्रश्न यही है कि यदि बदलाव की हवा चल रही है, तो उसके मुद्दे क्या होंगे? केवल सत्ता परिवर्तन पर्याप्त नहीं है। व्यवस्था, लोकतंत्र, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक चेतना पर स्पष्ट दृष्टि विकसित किए बिना कोई भी परिवर्तन अधूरा रहेगा।
