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मेघ, प्रेमी और किसान: आषाढ़ के बादलों और विरह का अद्भुत अहसास | डॉ योगेन्द्र
मेघ, प्रेमी और किसान: रात को भी बारिश हुई थी और सुबह भी। टहलने निकला तो बारिश हो ही रही थी। भींगी सड़कें, पहाड़ियों पर बारिश की सफेद चादर और भींगते पशु-पक्षी। बारिश की बूँदें जब दूबों पर गिरतीं तो दूबों की पत्तियॉं थरथरातीं। सबसे अच्छी बात यह थी कि बिजली कड़क नहीं रही थी, इसलिए ठनका गिरने का अंदेशा न था। ऐसे वक्त में मुझे पिता भी याद आये और कालिदास के यक्ष भी। पिता किसान थे और यक्ष प्रेमी। किसान के लिए आसमान में उमड़ते बादल सुकून देता है और प्रेमी के मन में उद्वेलन। यक्ष की विचित्र दशा थी। वह नव विवाहिता था। लेकिन यक्ष को उसके मालिक ने शाप दिया था। वजह यह थी कि यक्ष प्रिया की बाहों में इतना खो गया कि वह अपने मालिक कुबेर को समय पर पूजा के फूल नहीं पहुँचा सका। क्रोधित होकर यक्ष ने उसे अलकापुरी से पृथ्वी के रामगिरि पर्वत पर भेज दिया।
यक्ष के अंदर विरह की अग्नि और प्रज्वलित
वर्ष भर में यक्ष विरह की आग में जल कर दुबला हो गया। उस पर आषाढ़ का प्रथम दिवस आया और आये आकाश में काले- काले मेघ। यक्ष के अंदर विरह की अग्नि और प्रज्वलित हुई । यक्ष को कुछ समझ में नहीं आया तो वह कुटज के फूल लेकर मेघ के पास गया और प्रार्थना करने लगा – “ हे मेघ, जब तुम आकाश में उमड़ते हुए उठोगे तो प्रवासी पथिकों की स्त्रियाँ मुँह पर लटकते हुए घुँघराले बालों को ऊपर फेंक कर इस आशा से तुम्हारी ओर टकटकी लगाकर देखेंगी कि अब उसका प्रियतम अवश्य घर आयेंगे । तुम्हारे घुमड़ने पर कौन- सा जन विरह में व्याकुल अपनी पत्नी के प्रति उदासीन रह सकता है , शर्त यह है कि उसका जीवन मेरी तरह पराधीन न हो। “ यक्ष तो यक्ष था। सामान्य ह्रदय का यक्ष। जब राम सीता की तलाश में भटक रहे हैं और आसमान में बादल गरजने लगता है तो प्रिया के बिना उनका मन काँपने लगता है- “ घन घमंड नभ गरजत घोरा । प्रिया हीन डरपत मन मोरा।” प्रिया से बिछड़े प्रेमी का मन बादलों को देख कर बेचैन होता है, लेकिन किसान बादलों को देख कर अत्यधिक प्रसन्न होता है। कवि गाने लगता है-
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
मजा यह है कि अगर बादल आकाश में सिर्फ़ मँडराता है तो कवि कोसने से बाज नहीं आते। जानकी वल्लभ शास्त्री बादल को संबोधित करते हुए लिखते हैं-
उतर रेत में, आक जवास भरे खेत में
पागल बादल,
शून्य गगन में ब्यर्थ मगन मंड्लाता है!
इतराता इतना सूखे गर्जन-तर्जन पर,
झूम झूम कर निर्जन में क्या गाता है?
मैं हूँ किसान का बेटा
लेकिन मैं हूँ किसान का बेटा। मैंने मेघों के गर्जन- तर्जन भी देखा है और धारासार बरसा भी। जब धारासार बारिश हो रही होती। बारिश में दूर- दूर तक भींगते खेत, बरगद और पीपल के पेड़ और खेतों में अनेक हरवाहे और बैल। पिता खेतों में हल चला रहे होते और गुनगुनाते- सूरमा होय तो चढै रैन पर। उस वक्त मैं बच्चा था। उनके गाने का अर्थ समझता नहीं था। बाद में समझ में आया कि वे यह कह रहे थे कि जो सूरमा अर्थात् वीर होते हैं, वही युद्ध के मैदान में उतरते हैं । जब बारिश थमती तो पिता मुझे आदेश देते- खैनी लटाओ । मैं चूना और खैनी बायीं हथेली पर रखता और दाहिने हाथ के अँगूठे से खैनी और चूने को रगड़ने लगता। मैंने कभी खैनी खायी नहीं और पिता ने खैनी छोड़ी नहीं । पता नहीं क्यों खैनी लटा कर पिता को देते हुए अपूर्व सुख मिलता। जीवन भी अजीब है। आकाश में मेघ तो एक ही है, लेकिन उसको लेकर प्रेमी की प्रतिक्रिया अलग है, किसानों की अलग।
