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वंशीधर ब्रजवासी और आजम खान के बहाने: डॉ. योगेन्द्र ने बीजेपी और ईडी पर उठाए सवाल
सुबह से दो घटनाएँ ह्रदय को मथ रही हैं। पहली- बिहार के दो निर्दलीय विधान पार्षदों का बीजेपी ज्वाइन करना और दूसरी – जेल से निकलते ही आज़म खान की ईडी द्वारा गिरफ्तारी।
वंशीधर ब्रजवासी के बीजेपी में शामिल होने पर उठाए सवाल
वंशीधर ब्रजवासी से शिक्षकों को उम्मीदें थी। उसे बीजेपी सरकार के अफ़सरों ने पीटा था। उनके संघर्ष और उन पर हुई प्रताड़ना के कारण शिक्षकों ने उन्हें वोट दिया था। राहुल राज से कोई उम्मीद नहीं थी। वे जहाँ के थे, वहां चले गये। महान पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निकाला था। जब सूरज उग गया तो पार्टी ने सूरज को नमन किया। दरअसल पार्टी को अब नीति सिद्धांत से कोई मतलब नहीं है।
वंशीधर ने शायद राजनीति का लहू पी लिया है। वह किसी का भी कलेजा काट सकता है। मुज़फ़्फ़रपुर के आसपास के इलाक़ों में मल्लाहों की बहुत आबादी है। हो सकता है कि उन्हें इसमें आगे की राजनीति दिखा हो। बीजेपी की तो आदत है कि यूज़ करो और फेंक दो। जो भी हो, वंशीधर ने बहुत बड़ी गलती की है। अगर वह चुनाव के पहले बीजेपी में शामिल हो जाता, तब भी ठीक था, लेकिन चुनाव में लोगों को धोखे में रख कर विधान पार्षद बना और फिर धँसना दे दिया।
दरअसल दल बदल क़ानून में बहुत छेद है। लगता है कि यह छेद जानबूझकर छोड़ा गया। दल बदल क़ानून में एक अनुच्छेद यह होना चाहिए कि जो विधायक या सांसद जिस भी दल से जीते हैं, उन्हें उसी दल में रहना होगा। अगर वे दल बदलते हैं तो उनकी सांसदी या विधायकी नहीं रहेगी। उन्हें इस्तीफ़ा देकर फिर से चुनाव लड़ना होगा।
दल बदल भ्रष्टाचार और घृणित राजनीति का बहुत बड़ा स्रोत है। बीजेपी ने जिस तरह से दूसरी पार्टी के सांसदों को तोड़ा है, वह कहीं से भी नैतिक है? भगोड़े सांसद और विधायक तो गिरे हुए हैं ही, पार्टी क्या कम गिरी हुई है?
आजम खान की गिरफ्तारी और ईडी की कार्रवाई पर सवाल
आज़म ख़ान जैसे ही जेल से निकले, ईडी ने गिरफ्तार कर लिया। आज़म खान भागे तो नहीं जा रहे थे। उन्हें घर पहुँचने देते, फिर पूछताछ करते। सरकार के इशारों पर नर्तन करना ईडी को शोभा नहीं देता।
ईडी द्वारा किए गये मुकदमों में दस फ़ीसदी मुकदमे भी सही नहीं होते। बदनाम करने और सरकार के इशारों पर झूठे मुकदमे लादे जाते हैं और संविधान की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। एक ही तरह के केस में दो तरह के फ़ैसले आते हैं।
आज़म खान ने विश्वविद्यालय बनाया। यह बहुत बड़ा गुनाह था तो जिसने मंदिर का चंदा डकार गया, वह कम गुनाहगार है? चंदा की देखरेख करने वाली समितियों के सदस्यों को किसने नियुक्त किया? नरेंद्र मोदी, अमित शाह और मोहन भागवत ने ही न। समिति में उनके संगठन के ही लोग हैं तो फिर ईडी को हिम्मत है तो उपरोक्त लोगों से पूछिए कि केशव भवन कैसे बना और हर ज़िले में बीजेपी के आलीशान भवन कैसे बने? इनके यहां रुपया बरसता है?
देश की राजनीति और बुद्धिजीवियों की भूमिका पर टिप्पणी
इस देश का दुर्भाग्य है कि शीर्ष पर ऐसे लोग चढ़ बैठे हैं, जिनके पास कोई नैतिकता नहीं है। प्रज्ञा और ज्ञान का दावा करनेवाले साज़िश रचते हैं और समाज को खोखला करते हैं।
मजा यह है कि जनता का एक हिस्सा मद में चूर है। बुद्धिजीवियों की एक जमात भी हर हर गंगे में लगी हुई है।
बुद्धि और ज्ञान स्वतंत्रता में विकसित होते हैं। उसके अपने खतरे होते हैं। उसे उठा कर ही ज्ञान और बुद्धि सार्थक होते हैं।
