Sen your news articles to publish at [email protected]
यादें जो पीछा करती हैं: बारिश में भीगा भागलपुर और इतिहास की अनकही दास्तान, डॉ योगेंद्र की कलम से
यादें जो पीछा करती हैं: कल शाम को अच्छी ख़ासी बारिश हुई। मैं और अलका रास्ते में ही थे। मोटरसाइकिल से आ रहे थे। एक दूकान के पास खड़े हो गए। वह दूकान सोने की थी। बाहर में खड़ा देख दूकान वाले बाहर आये। बोले- अंदर बैठाइए। हम दोनों अंदर चले गए।
मैंने देखा कि सोने से सजे दूकान में एक बूढ़ा व्यक्ति मालिक की कुर्सी पर बैठा था। चेहरे और वस्त्र से लग रहा था कि बंगाली समूह के हैं। सड़क पर बारिश की बूँदें नर्तन कर रही थीं और अंदर स्मृतियों का रेला चल रहा था।
हम लोग जहाँ रूक गए थे, उसके सामने शारदा संगीत सदन और टाऊन हॉल है। शारदा संगीत सदन अब उतार पर है और टाउन हॉल पर पूरी तरह से प्रशासन का क़ब्ज़ा है। अगर कोई इस हॉल में कार्यक्रम करना चाहे तो लाखों की फीस चुकानी है।
उसके आगे चिल्ड्रन पार्क है। यह पार्क कभी जमींदार दीप नारायण सिंह का बैठकखाना हुआ करता था। पार्क के सामने दीप नारायण सिंह का आवास है जिस पर ज़िला जज का क़ब्ज़ा है। इस आवास में ज़िला जज कैसे रहते हैं, यह एक रहस्य है। यह आवास कम से कम पाँच एकड़ में होगा। बेहतर होगा कि सरकार इसमें हस्तक्षेप करे और जिला जज को सरकारी आवास दे।
मैंने सुना है कि उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। एक प्रभा नाम की बेटी थी जिसने उनके मन के खिलाफ शादी की थी, इसलिए उन्होंने संपत्ति का एक हिस्सा देकर शेष से बेदखल कर दिया था। उनकी जो संपत्ति थी, उसे उन्होंने पूर्वी बिहार की शिक्षा के लिए दान कर दिया था।
बाद में दीपप्रभा नामक एक सिनेमा हॉल बना जिसे दो- तीन महीने पहले बंद कर दिया। दीप नारायण सिंह यों तो कांग्रेस के लीडर थे, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में उनका बहुत बड़ा योगदान है। टी एन बी कॉलेज से लेकर कॉलिजिएट स्कूल के निर्माण में उनका अन्यतम योगदान है।
शरतचंद्र की स्मृतियां और गंगा का बदलता स्वरूप
दीपप्रभा सिनेमा के पीछे कभी महान कथाकार शरतचंद्र रहा करते थे। पीछे गंगा है जो अब नाले की तरह हो गई है। शरतचंद्र के बहुत से खेल इंद्रनाथ जैसे साथियों के साथ इसी गंगा की गोद में खेले गए थे।
फ़िलहाल गंगा उफनी हुई है। खतरे के निशान से ऊपर है। भागलपुर के निचले मुहल्ले में बाढ़ का पानी प्रवेश कर रहा है।
कल एक दुर्घटना गंगा में हुई। एक नाव बीच गंगा में धार की चपेट में आ गई। नाव पर सवार अनेक लोग तो तैर कर किनारे लगे, लेकिन कुछ लोगों की लापता होने की ख़बर भी है।
शरतचंद्र का मुहल्ला एक सांस्कृतिक मुहल्ले की तरह था जो अब उजाड़ पर है। अनेक घरों को ज़बर्दस्ती लोगों ने हथिया लिया है। अनेक लोग कोलकाता शिफ़्ट कर गये। कुछ लोग हैं जो पुरानी थाती सँभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन सच यह है कि वे चिथड़े चिथड़े हो गए हैं।
मंसूरगंज, जोगसर और पुरानी यादें
जहाँ हम लोग बैठे थे, उसके पश्चिम तरफ मंसूरगंज मुहल्ला है जिसे जोगसर भी कहा जाता है। इस मुहल्ले में वेश्यावृति होती थी जिसे लोगों ने मारपीट कर भगा दिया और अब उनके घरों पर भद्र जनों का क़ब्ज़ा है।
कहा जाता है कि विक्रमशिला महाविहार में पंच मकार की साधना होती थी। पंच मकार में एक मकार मैथुन है। सिद्ध लोग मैथुन के लिए यहाँ आते थे।
बारिश, तिलकामांझी और यादों का सफर
जब बारिश हल्की हुई तो हम दोनों ने दुकानदार को धन्यवाद दिया और मोटरसाइकिल पर सवार हो गए। तिलकामांझी तक आते आते धारासार बारिश होने लगी। संध्या रात में बदलने लगी थी।
तिलकामांझी की प्रतिमा अपनी दास्तान कह रही थी। यही वह स्थल है जहाँ बरगद के पेड़ से लटकाकर अंग्रेज़ों ने उनकी हत्या की थी।
हम लोगों ने बारिश में भींगते हुए चल पड़े। आसमान कड़क रहा था। बारिश में भीगते घर, पेड़, दोनों जेल, मैदान और सड़कें। बारिश में मोटरसाइकिल चलाना अच्छा लग रहा था और अच्छी लग रही थी देह पर बरसती बूँदें।
