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इन दिनों: आइए, नाख़ून कटा कर शहीद बनें — डॉ योगेन्द्र
इन दिनों: आइए, नाख़ून कटा कर शहीद बनें — डॉ योगेन्द्र लिखते है – नाख़ून कटा कर शहीद कहलाने का सुख अविस्मरणीय है। अगर आप सत्ता में हैं तो यह सुख आपको सहज ही हासिल हो जाएगा। इस सुख को प्रचारित करने के लिए सैकड़ों प्रचारक चैनलों पर मौजूद हैं। आप जैसे ही मंत्री-संतरी होते हैं, आप के अंदर एक राजा उग आता है। सहज और साधारण तो आप रह ही नहीं सकते।
आज अगर आप कुछ गाड़ियों की कटौती कर सकते हैं तो हर समय क्यों नहीं? देश कर्ज़े में डूबा है। माननीय प्रधानमंत्री के सौजन्य से दो सौ लाख करोड़ का कर्ज़ा हो चुका है। देश के अंदर पैदा कुछ नहीं करना है, न इसके लिए सोचना है, न कार्यक्रम बनाना है। कर्ज़ा लेकर ऐसी नीति बनानी है कि आम जनता भिखमंगी करे और पूँजीपति मालामाल हो।
पूँजीपतियों के लिए सरकार बिछ गई है
पूँजीपतियों के लिए सरकार बिछ गई है। बैंक का पैसा उसका, ज़मीन उसकी और संसद में बन रहे कानून उसका। पूँजीपतियों का तो यह स्वर्णकाल है। मौज ही मौज है। एक पूँजीपति पर तो प्रधानमंत्री ऐसे फ़िदा हैं जैसे लैला मजनूँ पर फ़िदा थी। महज़ एक टका में दस हज़ार एकड़ ज़मीन।
बिहार में कई ज़िलों में भवन बनाने के नाम पर ज़मीन की लूट होने वाली है। सरकार इसे विकास कहती है। लोग इस विकास की चकाचौंध के शिकार हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था फाइव ट्रिलियन की हो या न हो, इस पूँजीपति का मुनाफा ज़रूर फाइव ट्रिलियन की ओर दौड़ लगाएगा।
देश महान चौकीदार के हाथों सबकुछ सौंप दिया है
धन्य है यह देश जिसने ऐसे महान चौकीदार के हाथों सबकुछ सौंप दिया है। चाय तो उसने बेची नहीं, लेकिन ऐसी मार्केटिंग की गई कि देश को लगा कि बेचारा अभी-अभी स्टेशन पर केतली गर्मा रहा है।
विश्वगुरु बनने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है — मार्केटिंग। आप चाहे कीचड़ में ही क्यों न लिथड़े हों, मार्केटिंग कीचड़ को पवित्रतम वस्तु साबित कर देगी और आप दुनिया का नायाब हीरा साबित होंगे।
छल-कपट, दंड-भेद में अगर आप कुशल हैं तो आपका हाथ यमदूत भी नहीं पकड़ पाएगा। और अगर ड्रामे के गुण आपमें हैं तो आपकी तरक्की को कोई रोक नहीं पाएगा।
नेतन्याहू की आत्मा अंदर कुहराम मचा रही
घरों पर भगवा झंडे लगाओ — तथाकथित एक मुख्यमंत्री कह रहा है। वह देश में इज़रायली युद्ध लड़ना चाहता है। देश के अंदर गाज़ा बनाना उसका ख़्वाब है। नेतन्याहू की आत्मा उसके अंदर कुहराम मचा रही है।
अरे बेवकूफो, गर झंडा फहराने का ही शौक है तो हर घर पर तिरंगा फहराओ। नारा ही लगाना है तो जय संविधान करो। वैसे घरों पर झंडा फहराने से न रोज़गार मिलेगा, न अज्ञानता दूर होगी।
छल-कपट से मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन सकते हो, न गांधी बन सकते हो, न अम्बेडकर हो सकते हो। देश का संसाधन लुटा कर अपनी पार्टी के ख़ज़ाने में पैसा जमा कर सकते हो और सभी ज़िले में हाईटेक दफ़्तर खड़े कर सकते हो, मगर इतिहास में तुम्हारी श्रेणी दोयम दर्जे की ही होगी।
इन दिनों: आइए, नाख़ून कटा कर शहीद बनें
फ़िलहाल जिनके पूर्वजों ने आज़ादी की लड़ाई में सिर नहीं कटाया, उनकी संतानें नाख़ून कटा कर शहीद बन सकती हैं। अपने काफिले से दो-चार गाड़ियाँ घटा कर टेलिविज़न पर अपने त्याग का परचम फहरा सकती हैं।
डॉलर के सामने रुपए की कोई औक़ात तो रह नहीं गई है। वर्तमान प्रधानमंत्री Narendra Modi ताली बजा कर तत्कालीन प्रधानमंत्री Manmohan Singh से पूछते थे — “क्या कारण है कि रुपया पतला होता जा रहा है?”
प्रधानमंत्री जी, आप अपने पूछे गए प्रश्नों से शर्मिंदा नहीं हैं? आपको नींद कैसे आती है? अपने किए पर आपको थोड़ा भी पश्चाताप नहीं होता?
गद्दी तो आनी-जानी है। असल माप तो आदमी की आदमियत है। इतिहास इसी आदमियत का आकलन है।
