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सुबह की अधूरी दास्तान: सड़क पर कुचली बिल्ली से जेल की जंजीरों और गुरु की याद तक | डॉ. योगेन्द्र

subah ki adhuri dastaan dr yogendra
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सुबह की अधूरी दास्तान: सुबह टहलने के लिए ज्यों ही सड़क पर आया कि सड़क के बीचोंबीच दस – बारह कौए चोंच मारते नजर आए। नज़दीक पहुँचा तो कुचली हुई एक बिल्ली थी जिसके चिथड़े हो गए थे। मांस और ख़ून में ताज़ापन था। ऐसा लगता था कि बिल्ली को कुचले हुए ज़्यादा देर नहीं हुई थी।

सड़क पर ट्रकें कम चल रही हैं, क्योंकि गंगा ब्रिज टूट गया है। इक्के दुक्के कारें और ई रिक्शे। सड़क का जब से सिमेंटीकरण हुआ है, उसके किनारे नयी नयी दुकानें खुल गई हैं। सड़क के दोनों किनारे नाले बनाए गए हैं, लेकिन नाले बनाने वाले को भी नहीं पता कि इन नालों के पानी कहाँ जायेंगे? सड़क किनारे जो दुकानें हैं, उनमें बकरे काटने और चाय बेचने वाली दुकानें हैं । लगभग एक किलोमीटर पर ज़ीरो माइल है। यहां सड़क चौड़ी है, लेकिन सड़क पर ही दोनों किनारे सब्ज़ी बेचनेवाले बैठते हैं और लोग मोटरसाइकिल और कार लगाकर सब्ज़ी ख़रीदते हैं, इसलिए जाम की गुंजाइश बनी रहती है।

पोस्टर के एक किनारे पर नीतीश कुमार का चित्र

ज़ीरो माइल से आधा किलोमीटर दूर हवाई अड्डा है। मैं सड़क की बायीं तरफ चल रहा था। यहां जदयू का एक कार्यालय है। कई पोस्टर टंगे हैं जिसमें एक पोस्टर ने ध्यान खींचा। पोस्टर के एक किनारे पर नीतीश कुमार का चित्र है और दूसरे किनारे पर निशांत कुमार का। इससे थोड़ी दूर पर सड़क के किनारे ही बंसखोरों के कुछ झोंपड़े हैं। एक झोपड़े में एक कार्यालय बनाया गया है जिस पर डॉ भीमराव अम्बेडकर का पोस्टर है। ठीक उसके सामने एक चौकी जैसे काठ पर मरे हुए सूअर को धोया जा रहा था। सूअर की देह फूल गई है।

हवाई अड्डा नाम का हवाई अड्डा है। यहां कोई विमान उतरता नहीं है। यदाकदा प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री आते हैं तो उनके हेलीकॉप्टर यहां विराजते हैं। पहले खुला रहता था, लोग टहलते थे। अब पूरी तरह बंद है। सार्वजनिक संपत्ति पर प्रशासन क़ब्ज़ा करता जा रहा है और पब्लिक को बेदखल। आगे सड़क के उत्तर की ओर दो जेल है। संयोगवश मैं दोनों जेलों में रह चुका हूँ। दोनों जेलों में नामीगिरामी लोग भी रहे और समाज में बनाए गए अपराधी भी।

दो आँखें, बारह हाथ

हर सुबह यहाँ प्रार्थना होती है और ‘ दो आँखें, बारह हाथ‘ फ़िल्म के गीत गाए जाते हैं- “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम…. ऐसे हों हमारे करम….. नेकी पर चले और बदी से टले,…… ताकि हँसते हुए निकले दम……. ऐ मालिक तेरे बंदे हम…….” फिर क़ैदियों के गिनने की आवाज़ सुनाई पड़ती है । कैदखाने की अपनी जंजीरें हैं और बाहरी दुनिया भी क्या है? निजी स्तर पर आदमी भावनाओं का क़ैदी होता है, फिर समाज का और फिर राज्य का। नागरिकों पर इतने क़ानून लदे हैं कि उसे भी पता नहीं है।

हवाई अड्डा के दक्षिण तरफ ग्लोकल हॉस्पिटल है। मैं जब जब उस ओर से गुज़रता हूँ तो मेरे महान शिक्षक राधाकृष्ण सहाय की याद आती है। वे जब बीमार हुए तो यहीं भर्ती हुए थे। उनका जीवन बहुत शानदार था, लेकिन अंतिम कुछ महीने ठीक से नहीं गुजरे। वे हर दिन मुझे फोन करते थे। बहुत सारी बातें होतीं- निजी जीवन की भी और बाहरी परिस्थितियों की भी। हर शिष्य में गुरु का कुछ अंश रह जाता है। मैं अपने अंदर झाँकता हूँ तो मेरे अंदर उनका कुछ भी अंश नहीं है। तब भी वे अक्सर याद आते हैं। उनकी कर्तव्यपरायणता, ईमानदारी, छात्र- छात्राओं के प्रति संवेदनशीलता अभूतपूर्व थी। शहर में उनके ऐसे भी छात्र हैं जिन्होंने उनसे कक्षाओं पढ़ाई नहीं की, लेकिन वे मानते हैं कि राधाकृष्ण सहाय उनके गुरु हैं।

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